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वो मासूम सा चेहरा



वो मासूम सा चेहरा ,कुछ कहता है
वो सारी बिडम्बनाओ को सहता है।
दिन रात आंगन में खेलती है
चाँद और तारे मांगती है।

निभाती वो अपने  कर्तव्य को,
बेटी
बेटी
पढ़ाती अपने भाई बहनों  को।
है!उम्र छोटी,पर है वो समझदार,
जिसे करने है अपने सपने साकार।
डॉक्टर बनना वो चाहती है ,
अम्मा अब्बा से दरकार करती है।

पढ़ा दो मुझको कुछ और साल
कायम करने दो एक मिसाल।
जो कभी ना हुआ वो करना है,
इस घर से अशिक्षा दूर करना है।

ये सुनकर माँ बलखाती है
बेटा नही,तू बेटी है...
तेरा जीवन मात्र पति के अधीन,
स्त्री की है ये स्थिति दीन।

ना काम आएगा तेरा ये पढ़ाई लिखाई,
क्योंकि विवाह उपरांत, तू हो जाएगी परायी।
तब तेरा एक ही धर्म होगा,
पालन पोषण तक सीमित होगा

ना फैलाना तू अपने इन पँखो को,
ना जगाना तू अपने आत्मबल को
तू भले ही रहेगी मेरी आँख की पुतली,
पर ससुराल में रहेगी बनकर कठपुतली।

सुन बेटी को आत्मघात हुआ ,
इस व्यवस्था पर आश्चर्य हुआ।
ये दुनिया क्यों ज़ालिम है माँ,
बेटा बेटी में क्या फर्क है माँ?

ना जनन क्षेत्र में भिन्नता है,
ना आत्म बल में न्यूनता है।
दोनो की तब्बसुम दे,एक जैसा ही सुकून,
दोनो में ही है, सपनो को पूर्ण करने का जुनून।

तब क्यों दिया तबज़ु ,बेटो को ज्यादा
क्यों हुआ अट्हास ,बेटियो का ज्यादा।
क्यों बेटो को पलको पर रखा
क्यों बेटी को है बोझ समझा

इतने में जाग उठी ,माँ की चेतना
मानो भूल गयी हो वो पुरानी मान्यता।
जहाँ बेटा आंख का तारा होता था,
तो बेटी आंख का कांटा होती थी।

एक प्रण आज
उस माँ ने भी किया,
बेटी के संघर्ष को शीर्ष दिया
जिस मनोवृत्ति में जकड़े है लोग
उस संस्कृति में धरना है लोच
तब ये कहना न संशय होगा
मानस की सोच मे परिवर्तन होगा
परिवर्तन होगा.......


- मोनिका कुमारी मिश्रा
बी. ए. हिंदी ऑनर्स
द्वितीय वर्ष

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