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दो जून की रोटी



दो जून की रोटी
सहमी सिसकती
दो जून की रोटी
दो जून की रोटी

पसीने में डूब कर
स्वादिष्ट लगती।

लोकतंत्र के नारों में
रोती बिलखती।

संसद के गलियारे में
खूब करे मस्ती।

चुनावी रातों में
नोटों में बिकती।

भूख भरी रातों में
रोती सिसकती।

अम्मा के हाथों में
गोल गोल नचती।

बापू के पसीने में
मोती सी झलकती।

मुनिया की आँखों में
चाँद सी चमकती।



- सुशील शर्मा 


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