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धूप सिराहने बैठ गयी 


उठ! बेटा 
चिड़िया चहक रही 
मुडेर पर 
जहान जागा
अंधेरी निकल गयी 
गली मौहल्ले शहर से 
धूप सिराहने बैठ गयी 
झाड़ रही 
मुँह तपन से 
सुबह हो गयी। 
क्यों नींद में? 
लिपटे पड़े हो 
बिखराये बदन इधर उधर 
चादर भी सिमटी 
हो रही उदास 
हताश! 
खोल आँखें देखो 
प्रकृति ने बुन दिया है 
आँगन में 
चल चित्र। 
उठा बाजू 
हिम्मत जोड़ 
तोड़ दो नींद को 
क्योंकि तुम जागे? 
जहान जागा।




- अशोक बाबू माहौर 

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