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बात सीधी थी पर कुँवर नारायण
baat sidhi thi par Kunwar Narayan 


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बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई ।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आये-
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई ।

व्याख्या - कवि कहता है की वह अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करने के लिए बात कह रहा था .बात बहुत साधारण थी ,लेकिन सही भाषा के प्रयोग के चक्कर में बात उलझती रह गयी .कवि का मानना है कि सही बात कहने के चक्कर में भाषा में बहुत प्रकार के बदलाव किये गए .भाषा को तोडा - मरोड़ा गया ,लेकिन वह अपने मन के भावों को ठीक ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर पाया .कवि यह प्रयांत्न करता रहा कि वह भाषा के जंजाल से मुक्त हो पाए ,लेकिन बात बहुत जटिल हो गयी . 

२. सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनायी दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह।

व्याख्या - कवि कहता है कि वह मन को भावों को अभिव्यक्त करने के चक्कर में बात के पेंच को कसता चला गया .इससे पेंच खुलने के बजाय ,उसकी चूड़ी कसती चली गयी .इससे कवि की भाषा कठिन और पेचीदा हो गयी .जबकि शब्दों के आडम्बर पूर्ण प्रयोग से दर्शक उसे शाबासी दे रहे थे .अतः उचित भाषा के अभाव में ,सहजता और सरलता उलझी ही रही गयी . 

३. आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था –
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी ।
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया ।
ऊपर से ठीकठाक
पर अन्दर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त ।
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?”

व्याख्या - कवि कहता है कि अपनी अभिव्यक्ति को पैना करने के चक्कर में उसकी भाषा दुरूह हो गयी .अतः शाब्दिक चमत्कार करने के चक्कर में जोर जबरदस्ती से बात की चूड़ी भर गयी और उसकी सहजता समाप्त हो गयी .अतः अंत में हार कवि ने अपनी उलझी हुई बात को जहाँ पर वह थी नहीं छोड़ दिया लेकिन शब्दों में कसाव नहीं थी ,भावों में गहराई और दृढ़ता समाप्त हो गयी .तभी एक चमत्कार हुआ कि बात को एक शरारती बच्चे की तरह जो खेल रहा था परेशान हो चुके कवि ने चेताया कि भाषा का उचित प्रयोग करना सीखो .अच्छी भाषा में दबाव या मेहनत की जरुरत नहीं होती है ,वह सहूलियत के साथ हो जाती है . 

बात सीधी थी baat sidhi thi par baat seedhi thi par poem summary कुँवर नारायण Kunwar Narayan कविता का सार /मूल भाव /केन्द्रीय भाव - 

बात सीधी थी पर कविता कुंवर नारायण जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध कविता है .कविता में कथ्य और माध्यम से द्वन्द उकेरते हुए भाषा की सहजता की बात की गयी है .हर बात के कुछ ख़ास शब्द नियत होते हैं ठीक वैसे ही जैसे हर पेंच के लिए एक निश्चित खाँचा होता है .भाषा को तोडा - मरोड़ा गया ,लेकिन वह अपने मन के भावों को ठीक ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर पाया.कवि यह प्रयांत्न करता रहा कि वह भाषा के जंजाल से मुक्त हो पाए ,लेकिन बात बहुत जटिल हो गयी .अब तक जिन शब्दों को हम एक दूसरे के पर्याय के रूप में जानते रहे हैं ,उन सब के भी अपने विशेष अर्थ होते हैं .अच्छी बात या अच्छी कविता का बनना सही बात का सही शब्द से जुड़ना होता है और जब ऐसा होता है तो किसी दबाव या अतिरिक्त मेहनत की जरुरत नहीं होती वह सहूलियत के साथ हो जाता है .बात को एक शरारती बच्चे की तरह जो खेल रहा था परेशान हो चुके कवि ने चेताया कि भाषा का उचित प्रयोग करना सीखो .अच्छी भाषा में दबाव या मेहनत की जरुरत नहीं होती है ,वह सहूलियत के साथ हो जाती है . 

बात सीधी थी baat sidhi thi par baat seedhi thi par poem  कुँवर नारायण Kunwar Narayan baat sidhi thi par questions and answers ncert solutions for class 12 hindi aroh class 12 hindi chapters summary कविता के साथ



प्र.५. भाषा को सहूलियत से बरतने से क्या अभिप्राय है ?

उ.५. कवि कहता है कि अपनी बात सीधी व सहज रूप से न कहकर तोड़ - मरोड़कर या घुमा - फिराकर कहने से बात उलझती चली जाती है .आडम्बरपूर्ण अभिव्यक्ति से दूर हटकर भाषा को सहूलियत के साथ प्रयोग करना चाहिए .अतः कवि का मानना है कि बात स्वाभाविक होना चाहिए ,ताकि कविता का आस्वादन आम लोग कर सके . 

प्र.६. बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं ,किन्तु कभी - कभी भाषा के चक्कर में सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती हैं " कैसे ? 

उ.६. कवि का मानना है कि बात और भाषा परस्पर सम्बंधित होते हैं .किसी बात को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा को सीधे ,सरल और सहज शब्दों में न कहकर तोड़ - मरोड़ कर उलट - पलट कर शब्दों को घुमा - फिराकर कहने से बात पेचीदा हो गयी .अतः सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है ,हमारे कथ्य और भी जटिल होते गए .


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