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अखबार खोलते ही 


अखबार खोलते ही
देखा
अखबार खोलते ही
अखबार खोलते ही 
दूसरे पन्ने पर
किसी कवि की कविता
छपी थी
बड़ी मधुर
जी चाह रहा
बार बार पढूँ
पढ़ता जाऊँ
सुबह शाम
दिन रात।
किंतु व्यस्तता मेरी
मुझ पर हावी
बार बार सताये जा रही
न दे रही
एक पल
कि पढ सकूँ
बैठकर
और सुनाऊँ हवाओं को
पेड़ पौधे लताओं को
अपनी दयनीय स्थिति को
ताकि खुद समझ सके
मेरा अपना वजूद।


- अशोक बाबू माहौर 

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