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आँसू


किसी की साँसों में ना घोलो अपनी साँसों को,
उनमें मिलकर वो अपनी अहमियत को खो देंगी
किसी की साँसो के संग पराई भी हो जाएँ,
आँसू
आँसू
तो दुखेगा मन कि साँसें भी मेरी अपनी नहीं.

किसी की साँसो में उलझी हैं तेरी सें क्यों ?
किसी की राह सदा तकती तेरी निगाहें क्यों ?
उखड़ेगी उसकी साँस तो क्या लौटेगी तेरी साँस ?
न जाने लिए बैठी है क्या तू मन में आस ?

खुद अपने ही आँसू न रोया करो,
दूसरों को न आँसू रुलाया करो,
बाँट सकते हो आँसू किसी के भी तुम,
पर किसी को न आँसू बॉँटा करो.

बेवजह आँसुओं को ना बहाया करो,
कुछ खुशी के लिए भी बचाया करो,
अब अकारण ही रोना करो बंद तुम,
रोकर सुखा दोगी अश्क स्वच्छंद तुम,

भावनाएँ जो बहती हैं आँसुओं के संग,
रूठ जाएँगी आँसू को जो होगी तंग,
भावनाओं से तुम यूं न खेला करो,
खुद ही अपने से क्यों तुम झमेला करो.

न बँट पाएँगे ना ही झर पाएँगे,
सुख दुख भी मन में सिमट जाएँगे
कितना सँभालोगी सुख दुख का ये बोझ तुम,
इक दिन तुम को लेकर ये ढल जाएगी,


इसलिए अभी से करो यत्न तुम,
आँसुओं को बचाओ, ना करो खत्म तुम,
बीता जो जीवन रीता गया ,
पर बचे को तो अब मत करो भस्म तुम.



यह रचना माड़भूषि रंगराज अयंगर जी द्वारा लिखी गयी है.आप स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है .आप की विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन पत्र -पत्रिकाओं में होता रहता है.संपर्कसूत्र - एम.आर.अयंगर.8462021340,वेंकटापुरम,सिकंदराबाद,तेलंगाना-500015  Laxmirangam@gmail.com

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