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विद्यापति


वीरगाथाकाल में विद्यापति का अपना अलग महत्व हैं .आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनकी गणना वीरगाथाकाल तथा अपभ्रंश साहित्य के फुटकर साहित्यकारों में की हैं .इनके रचना माधुर्य को देखकर इन्हें मैथिल कोकिल की संज्ञा
विद्यापति
विद्यापति 
और कुछ लोग इन्हें अभिनव जयदेव भी कहते हैं .इनका जन्म सन १४१७ में बिहार के मधुबनी जिले के विस्पी गाँव में हुआ था और मृत्यु सन.१५०५ में हुई .इनके पिता ठाकुर गणपति महाराज भी सुप्रसिद्ध विद्वान थे .ये महाराज शिव सिंह के आश्रित कवि थे .विद्यापति एक महान पंडित थे .इनकी रचनाएँ संस्कृत ,अवहठ और मैथिली भाषा में लिखी गयी है .संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करके ये स्थायी रूप से दरभंगा राजदरबार में रहने लगे थे .यहाँ इनको शिव सिंह ,नरसिंह देव ,कीर्ति सिंह आदि का संरक्षण बराबर मिलता रहा .

विद्यापति की रचनाएँ - 

इनकी रचनाएँ तीन भाषाओँ में मिलती हैं - 
१. संस्कृत - 
गंगा वाक्यावली ,पुराण संग्रह ,भू परिक्रमा ,दुर्गा भक्ति ,तरंगिनी आदि .ये रचनाएँ कवि का धर्म भावना व्यक्त करती हैं . 
२. अपभ्रंश - 
कीर्तिलता और कीर्ति पताका अपभ्रंश की रचनाएँ हैं .कीर्तिलता में कवि ने तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह के युद्यों और उनके शौर्य का वर्णन किया है .कीर्ति पताका शिवसिंह का यशोगान है . 
३. मैथिली - 
इस भाषा में विद्यापति की पदावली की रचना की गयी है .इस काव्य की भाषा के सम्बन्ध में कवि ने स्वयं लिखा है - 
बाल चन्द विज्जावइ भाषा । दुहु नहि लग्गै दुज्जन हासा ॥
श्री परमेश्‍वर हर सिर सोहई । ई णिच्चई णाअर मन मोहइ ॥ 


विद्यापति का काव्य गौरव उनकी पदावली पर निर्भर है .इनके गीतों पर मुग्ध होकर बंगला भाषा - भाषी इन्हें बंगला और हिंदी भाषा भाषी इन्हें हिंदी का कवि मानते हैं .विद्वान इनके सम्बन्ध में कई प्रश्नवाचक चिन्ह लगते हैं - 

  • विद्यापति वैष्णव थे अथवा शैव ?
  • विद्यापति श्रृंगारी कवि थे अथवा भक्त कवि ?
अधिकाँश विद्वान इनको श्रृंगारी कवि मानते हैं .डॉ.रामकुमार वर्मा तो यहाँ तक कहते हैं - 
"विद्यापति के बाह्रय संसार में भगवत भजन कहाँ ? इन वय: संधि में ईश्वर से संधि कहाँ ? सद्यस्नाता में ईश्वर से नाता कहाँ और अभिसार में भक्तिसार कहाँ ? उनकी कविता विलास की सामग्री है ,उपासना की साधना नहीं .उससे ह्रदय मतवाला हो सकता है ,शांत नहीं . 


देखदेख राधा-रूप अपार।
अपुरुष के बिहि आनि मिला ओल।
खिति-बल लावनि-सार।
अंगहि अंग अनंग मुरछायत,
हेरए पडए अधीर।


विद्यापति की पदावली  - 

विद्यापति में वीर ,भक्ति और श्रृंगारी तीनों रूपों की सफल झलक दिखाई पड़ती है .विद्यापति की लोकप्रियता और प्रसिद्धि इनका पदावली काव्य है .यह बोलचाल की मैथिली भाषा में लिखित है .इसमें राधा कृष्ण के प्रेम का काफी वर्णन है.इनकी श्रृंगारिकता बहुत ही प्रसिद्द है.इनकी भाषा बहुत मधुर है.आचार्य शुक्ल के शब्दों में विद्यापति के पद अधिकतर श्रृंगार में ही है . 


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