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रहिमन पानी राखिए


माननीय डॉक्टर नीतू सिंघल जी ने एक जगह अपनी अर्धाली में यह कहा है कि यह कोई अचरज की बात नहीं कि अच्छों के बुरे और बुरो  की संतान , अच्छे होते हैं ।यही बात रामचरितमानस की अर्धाली में कही गई है कि -

“जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ” | 

आदमी  का  पानीदार  होना बहुत जरूरी है अर्थात वह  पढा  लिखा या जैसा भी हो उसे गुणी अवश्य होना चाहिए उसे आच्छे व बुरे की समझ   जरूर  हो आज के मा-बाप इस  पर ध्यान दें रहीम ने कहा भी था कि रहिमन पानी राखिए ,बिन पानी सब सून ,पानी का अर्थ जरूर  जान  लें ।

कभी बचपन में एक  गीत  मैंने  सुना  था :पंक्तियां  बिखरी  हुई   हैं , 

 “ एसे ही  दूध  जमन  लागे  तब  जामन  का  क्या  होगा  ,
 फूफा  ही  भात   भरन  लागे  तब  मामन  का  क्या  होगा  “ 

अर्थात इस संसार में अच्छे और बुरे दोनों ही का होना अनिवार्य है.आप अच्छे की महत्ता तभी स्वीकार या महसूस करते  हैं ,चूंकि  बुरा  सामने है ,नहीं  तो  टेनीसन  की  कविता  में ( लोटोस ईटर्स ) की  तरह  सब  एक जैसे  होंगे  ,न कोई  किसी  से कम , न ज़्यादा ,लेकिन इससे  काम  आगे  न बढेगा,यही बात अंग्रेजी कवि विलियम ब्लेक ने द मैरिज ऑफ हेवन एंड हेल मैं कहीं है और करीब करीब यही बात चीन की एक महिला प्रोफेसर ने अपने शोध लेख में कही है ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी  रचने वाले महर्षि वाल्मीकि इसे लिखने  से  पहले जननी और जन्मभूमि
साहित्य
दोनों को ही कलंकित कर रहे थे, यह वाल्मीकि जी का उत्तर और पूर्व चरित है।समय चीजों  को  बदल देता  है।
अरिस्तू ने यह क्या कह दिया के चरित्र अगर शशक्त है तो कहानी इतनी जरूरी नहीं है।केथार्सिस तो अरस्तू ने परिभाषित ही नहीं किया था विद्वानों ने अपने-अपने अर्थ और निर्वचनों से बहस आगे बढ़ाई परंतु यह तो कहानी उपन्यास महाकाव्य नाटक में आधार कहानी ही है कहानी के लिए ही सामान्य व्यक्ति फिल्म रसिया और नाटक देखने जाता है और अरिस्तू ने यह क्या कह दिया कि जो इतनी आलोचना का विषय बन गया है।
जो विचार की प्रधानता प्लेटो ने  बताई तो अरस्तु सहमत न  हुए उन्होंने कहा था कि मानव शरीर में एक अंतर्गत तंत्र एवं दूसरा बाय तंत्र काम करते हैं इसमें भी भेद होंगे पहले तंत्रिका तंत्र में सोने का हिरन आकर्षित होने का विचार या मान लीजिए कोई भी वस्तु का विचार आया होगा , तभी उसके चुराने का बाहरी जगत में विचार किया होगा।
यहां चरित्र की प्रधानता से अरस्तु का आशय क्या है चरित्र हम पाते हैं कि 2 तरह से बनता है  

1. मां-बाप के द्वारा संस्कार गर्भनाल एवं उसके बाद 
2 .अभ्यास से, व्यवहार से ,परिश्रम से,  एकलव्य का कोई गुरु नहीं था

लगातार अभ्यास करते रहने से गलतियों में सुधार आता है यह बारंबारता ही विश्वास कि मैं भी ऐसा कर सकता हूं प्रदान करती है चरित्र में कई चीजें शामिल हैं -

  1 विवेक क्या करना है और् क्या नहीं ,
  2 सहज बुद्धि, जड़ नहीं
  3 कर्मसु कौशलम् ,विचार को व्यवहार में बदलना
  4 लोक कल्याण, how a person behaves in a given time and   circumstances , constitutes the character , and repeated actions generate confidence

राम ने गद्दी त्यागी, यहां तक  ठीक,भरत बैठते यहां तक ठीक , लेकिन वनगमन के सवाल पर वह सवाल जवाब भी कर सकते थे, कि  क्या प्रयोजन ?गद्दी के लिए लड़ ही नहीं रहा, तो क्या घर, क्या परदेश।

हमें विद्यार्थी काल की प्रोफेसर ओम प्रकाश गोविंल् जी की कक्षामें दिए  के प्रवचन अभी तक याद है कि अमुक एक दी गई परिस्थितियों में, एक दिए हुए समय में किस तरह बर्ताव करता है, यह उसका चरित्र चरित्र ( एक्शन) का ही दूसरा नाम है जैसे उदाहरण से समझिए, कीचक राजा विराट का साला,  पांडव तो मुसीबत के मारे हैं , तो उसकी नजर द्रोपदी को परेशान करने की है,किसी की मजबूरी का फायदा उठाना।तो यह अधम चरित्र वाले ओछे काम और ओछी हरकत करने वाले होते हैं बल या शक्ति का प्रयोग निर्बल अथवा कमजोर को सशक्त बनाने में हुआ होता , तो इससे बढ़िया क्या बात होती।ज्ञान कर्म एवं भक्ति का बीज मंत्र ,आपके काम किसी के चेहरे की मुस्कान  बनै तभी सार्थक होता है। केन के पिता का कोई चरित्र न होता तो अर्थर् राजा ना होता।

क्षेत्रपाल शर्मा
क्षेत्रपाल शर्मा
एक्शन शब्द के फौजी सिविल फिजिक्स में संदर्भगत अर्थ भिन्न-भिन्न है लेकिन साहित्य ,वह भी नाट्य विधा में एक ही अर्थ है।वह है अभिनय ,अभिनय जितना सशक्त होगा ,उतना ही पात्र में प्राण-प्रतिष्ठा जीवंत होगा उसका मुख्य आधार पात्र द्वारा अभिनय अर्थात संवाद अदायगी से है ,डायलॉग डिलीवरी।इसमें संवाद और शारीरिक अभिनय बेमेल हुए तो चरित्र फीका रहेगा।
किसी का भी  गलत सोच और गलत कल्पना उसे ओछा बना  देती  है ,और  उसे कहीं  का  नहीं छोडती ।आप कंगाली ,बीमारी अर धोखे खाने पर तो गिरकर संभल सकते हैं ,लेकिन चोरी , लम्पटता और कपट के कारण किसी  की नज़र से  गिरे  हैं  तब  उठ नहीं  सकेंगे ।

डॉओम प्रकाश गोविल जी ने जो हमें पढ़ाया हुआ था कि माइंड की दो एक्टिविटीज है ,हायर एक्टिविटी ऑफ माइंड एंड लोअर एक्टिविटी ऑफ माइंड , वे दोनों क्रियाएं इस तरह से समझने की हैं कि नाभि के ऊपर से की गई क्रियाएं उच्चतर मानी गई है तथा नाभि के नीचे की  निम्न क्रियाएं मानी गई।
इसी प्रसंग में पतंजलि  के योग सूत्र कि 5 तरह की अग्नि , भूताग्नि,  कामाग्नि जठराग्नि बड़वाग्नि और ज्ञानाग्नि (मणिपुर चक्र )सहज ही आपको याद हो आता है ।इसमें स्पष्ट है सेक्स ,  जोकि आलस्य को जन्म देता है।साहित्य , undoubtedly , work of art ,  fine arts and literature are the higher activity of mind i.e. that is palace of Art by Tennyson.
जस्टिस पिलेट ने पूछा था कि सत्य क्या है। सत्य को परिभाषित करना थोड़ा कठिन कार्य है ।प्रमेय् सिद्धांत की अवधारणा जिसे सिद्ध किया जा सके,निर्मेय् वह् रचना, साधारण या संभव, जिसे बनाया जा सके (लंगडी भिन्न 17 ऊंटो  का  बंटवारा .3 बेटों में ,एक बटे दो ,एक बटे तीन और एक बटेनौ  की हिस्सेदारी ?  तो क्या सिक्के के बदलने को सत्य बदलना कहें।यह समझाया जाता है कि पहले धरती के इर्द-गिर्द सूर्य घूमता था अब यह धरती सूर्य के चारों तरफ घूमती है तो क्या इसे सिद्ध किया जा सकता है।
साहित्य का मूल उद्देश्य मनोरंजन, द्वितीयक है , लेकिन बुनियादी उद्देश्य जीवन में उछाल लाना है।यथार्थ और कल्पना में व्यवहार  में  बडा  फर्क  है  गलत  सोच और गलत कल्पना  हमें  सही  मार्ग  से  भटका /भ्रमित  कर देती  है  जैसे  अगर  कोई किसी  आयु  वाले  लडके  की  शादी  कराने  की  बात  कहता   है  तो  उसके  पीछे खाने पीने  की  जुगाड  है , इसी  तरह  धन  लेने  के  इरादे  से  दामाद  जब  संकट  में  मदद करने  की  गुहार लगाता  है  तब  वह   लिए या लिए जा रहे धन को  लौटाने का विचार  नहीं  कर रहा  होता  , इसी  तरह गांव   में   रडुआ  लोगों  की  सुरक्षा   को   लेकर  कुछ  मुद्दे  हैं ।

किशोरवय  में  कालेजों   में  बच्चे  जो  अशोभनीय  वार्तालाप और  खिल्ली उडा रहे  होते  हैं ,तब अध्यापक का कर्तव्य बनता है कि वह सुदामा और कृष्ण ,द्रोणाचार्य और द्रुपद ,और पृथ्वी राज चौहान और जै चन्द के   बचपन के दिनों  की  बात  बताएं ।छोटी  बातें भी अगर भुलाई न जाएं तो विकराल रूप ले लेती  हैं ,और बदले  लेने में आदमी अंधा,वरन पागल हो जाता है ।कभी कभी आप अपमान का घूंट पी भी लेते हैं ,तब कोई हेटी की बात नहीं ।    

मेरी बेटी जो बी.एड कर रही है ,ने देखा कि अधिकांश विद्यार्थियों  के  ग्रुप  बने  हैं या तो  ग्रुप में  हो जाओ,नहीं तो उनको उसी ग्रुप में ही सहायता करना ,उनके साथ् ही घूमने जाना और खाना पीना,अन्य की खिल्ली उडाना,अपने  से  कम समझना ,मौज करना (ज़्यादा  है,पर  लिख  नहीं रहा )उनका रोज का  काम है।समायोजन वाले  पाठ  पर (केस स्टडी), ऊपर  से  तुर्रा  मार  देना!वह समायोजन नहीं वरन सामाजिक रूप से अस्वीकार्य व कानूनी  भाषा में  “ रैगिंग् “ है।समाज  से सरोकार वाली बात  लिखना ज़्यादा ठीक है,कलकता  के एक कॉलेज से रात दस  बजे मेरी बेटी  लौटती  तो  बताती  कि  टीचर ही  देर  से आते हैं।एक  दिन , रात 9  बजे  मैं  कालेज गया,बात  सही  पाई।तो  मैंने परिचय के बाद ,टीचर से ही प्रश्न किया कि  क्या  ये  समय  है  विद्यालय्  का ?इस तरह  धूप  में  बच्चों की  प्रेयर  खतम  होते  ही प्रधानाचार्य अपने  भाषण देने के लोभ को भी संयम  रखें .आप के पास  जो प्लेट्फार्म  है,वह इस के लिए नहीं वरन आप को समझने के लिए बच्चों की उमर वह नहीं  हैं।गरमी और उमस  के  कारण, मैंने 3 - 4 बच्चों  को  गिरते  हुए  खुद देखा  था।
किस  तरह  गरीबी में लाल बहादुर शास्त्री जी ,अब्दुल कलाम  साहब  ने  अपनी  मंज़िल  को  प्राप्त  किया   वह   समायोजन   नहीं  वरन सामाजिक  रूप  से  अस्वीकार्य व  कानूनी  भाषा   में  “ रैगिंग् “  है  इस  तरह इंडक्टिव   मेथड्  और    डिडक्टिव  मेथड  से   किशोरों  को   सही   मार्ग  पर  लाए  जाने  की  जरूरत है ।
कल्पना हमें जयशंकर प्रसाद के नाटक ध्रुवस्वामिनी पर विचार करने को बाध्य करती है जो कि एक उद्देश्यपूर्ण कल्पना है इसलिए कि नायक राजा का कोई चरित्र नहीं ।रानी, राजा के छोटे भाई की वीरता, सही  सोच ,  बुद्धि चातुर्य के कारण उसका  वरण करती है।

जबकि कालिदास कवि के स्वयं के जीवन में यथार्थ से जब पाला पड़ा ,तो जीवन के रास्ते अलग अलग हो जाते हैं ,क्योंकि यहां ठगी की गई है , रेखा के साथ ठगी चोरी छीना-झपटी  और कपट से प्राप्त पदार्थ की कोई आयु नहीं होती ,जैसे आती है वैसे ही जाती है।

जीवन का सार यह है कि जैसा आप चाहते हैं वैसा   होता नहीं, उदाहरण के तौर पर यदि पौधा आम का लगाया जाता है तो उसे पेड़ बनने पुष्पित एवं पल्लवित होने और अंततः फल लगने में कई बातें काम करती हैं इनमें जो वाला कीड़ा आंधी सूखा बरसात से बचेगा और तब जब बौर लगेगा उसमें भी कीड़ा, तोता का कुतरना आदि कई जोखिम हैं , एक - दो  फल खराब होगा,  तो भी उस पेड़ पर लगने वाले सभी फल खराब नहीं होंगे ।
बहुतायत ठीक , अंत ठीक , तो सब ठीक।ईश्वर ने प्राणी मात्र को बुद्धि दी है यह अलग बात है कि वह सुप्त है अथवा जागृत है।

इसी विवेक बुद्धि से वह भाव एवं कल्पना के सहारे निराकार विचारों को रूपायित करता है भाव् एक शब्द में हो सकता है लेकिन उसके पीछे प्रकाश पुन्ज लिपटा रहता है।
कल्पना की एक सुंदर उड़ान का नमूना कालिदास की रचना मेघदूत है जिसमें बादलों को दूत् बनाकर यक्षिणी तक संदेश पहुंचाना कल्पना, कवि की है इस तरह उमड्ते मेघो के सहारे कालिदास की कल्पना के साथ मिलकर एक अनन्य कृति की रचना को जन्म दिया , नागार्जुन ने  सही कहा  है कि  मेघदूत अलकापुरी से कुबेर द्वारा यक्ष को निकालने पर और रामगिरी पर गुजरते बादलों को दूत बनाकर यक्षिणी तक संदेश पहुंचाना,  इस तरह जीवन एवं कल्पना का उद्योग प्रसार भारतीय साहित्य में अन्यत्र नहीं मिलता।यह यथार्थ से कहीं ज़्यादा जीवंत  और  बढकर  है ।हर  समय  तर्क  और  कुतर्क   से  जीवन   नहीं  चलता   और  न  ऊंच  नीच   की तुलना  करते  रहने  से, गिरधर की  यह   कुंडली   देखिए :
“साईं  ये  न  विरुद्धिए,गुरु  ,पंडित , कवि यार  , बेटा ,बनिता ,पौरिया  ....इन तेरह  से  तरह  दिए  ही  बनिहें  साईं"

साहित्य एवं कला की किसी कृति के उत्कृष्ट और सुंदर होने की अगर जांच करनी है तो हमें उसके बारे में विद्वानों ने जो लिखा एवं जो कुछ कहा  है ,उसे अवश्य पढ़ना चाहिए।






 संपर्क  - क्षेत्रपाल शर्मा
 म.सं 19/117  शांतिपुरम, सासनी गेट ,आगरा रोड अलीगढ 202001
 मो  9411858774    ( kpsharma05@gmail.com )




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  1. मैं कोई डाक्टर नहीं हूँ महोदय एक साधारण सी गृहणी हूँ मेरा दृष्टांत देकर आपने मुझे जो प्रोत्साहन दिया उस हेतु धन्यवाद !

    हाँ यह छाया मेरा नहीं है ये इधर-उधर से चोरी किया हुवा है

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  2. टिप्पणी आज अभी देखीं |
    मेरे लेख् के प्रारंभ् में, “ नीत- नीत ” शीर्षक ब्लोग की रचयिता आदरणीय लेखिका मा. नीतू सिंघल जी की अर्धाली का सार् है |

    जो भूल हुई , वह मेरी है |
    ससम्मान् , क्षेत्रपाल शर्मा , 30.05.18

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