0
Advertisement

नित जीवन के संघर्षों से nit jeevan ke sangharshon se


नित जीवन के संघर्षों से ,
जब टूट चुका हो अन्तर्मन।
तब सुख के मिले समन्दर का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं ।।
जीवन
जीवन

जब फसल सूख कर जल के बिन ,
तिनका -तिनका बन गिर जाये।
फिर होने वाली वाली वर्षा का ,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन ,
यदि दुःख में साथ न दें अपना।
फिर सुख में उन सम्बन्धों का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण ,
निकले जाते हैं रोज़ यहां।
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का ,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

मन कटुवाणी से आहत हो ,
भीतर तक छलनी हो जाये।
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का ,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों ,
पर काया रोगों का घर हो।
फिर उन अगनित सुविधाओं का ,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।


- रामधारी सिंह दिनकर 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top