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मित्र की परख Mitra Ki Parakh बच्चों की कहानियां

एक नगर में एक बुद्धिमान तथा धनी व्यापारी रहता था .उसके एक पुत्र था .पुत्र पिता की तरह समझदार नहीं था . उसके मित्र हमेशा उसका फायदा उठाते फिर भी वह मित्रों की बातों में आकर उन पर विश्वास किया करता था . 
मित्र
मित्र
एक बार पिता पुत्र दोनों को व्यापार के लिए विदेश जाना था .पिता ने अपने सभी कीमती समान एक बक्से में भरे और उसमें तीन ताले लगा दिए . पिता पुत्र से बोला कि हम दोनों को बाहर जाना है अतः इस बक्से को किसी विश्वासपात्र व्यक्ति के पास रख देना चाहिए .पुत्र ने अपने मित्र का नाम लेकर कहा कि उसके घर पर बक्सा रख देना चाहिए . इस पर पिता ने पुत्र से कहा कि तुम जाकर मित्र से पूछ आओ कि बक्सा वह रखने को तैयार है या नहीं . 
पुत्र मित्र के पास गया और बक्सा रखने के बारे में पूछा . मित्र प्रसन्नतापूर्वक बक्सा रखने को तैयार हो गया . पुत्र बक्से को अपने मित्र के यहाँ रख आया . फिर पिता पुत्र दोनों विदेश चले गए . 
कुछ दिनों पश्चात जब दोनों वापस आये तो पिता ने पुत्र से कहा पुत्र ! वह बक्सा अपने मित्र के यहाँ से ले आओ . 
थोड़ी देर बाद गुस्से में तमतम्ताया हुआ पुत्र वापस आया और बोला - पिताजी ! यदि आपको मेरे मित्र पर भरोसा न था तो बक्सा वहां क्यों रखवाया .आपने तो कहा था कि उसमें कीमती समान है मगर उसमें तो कंकड़ - पत्थर भरे पड़े हैं . 
पिता शांतिपूर्वक पुत्र की बातें सुनता रहा ,फिर बोला - पुत्र ! कंकड़ पत्थर की बात तुम्हें कैसे पता चली . पुत्र ने कहा - मेरे मित्र ने बताया . 
पिता ने कहा - तुम्हारे मित्र को कैसे पता चला की बक्से में कंकड़ पत्थर हैं . अवश्य ही उसने बक्सा खोला होगा और उसे बक्सा खोलने की क्या आवश्यकता थी .हे पुत्र ! अब तो तुम्हें समझ आया होगा कि तुम्हारा मित्र कैसा है . जब तुम अपने मित्र से पूछने उसके घर गए थे तभी मैंने तुम्हारे मित्र को परखने के लिए बक्से में से कीमती समान निकालकर उसमें कंकड़ पत्थर भर दिए थे . 
पुत्र की आँखें खुल गयी .उसने पिता से कहा - मुझे माफ़ कर दीजिये .मैंने पहले आपकी बात नहीं मानी और नुकसान उठाता रहा . अब मैं समझ गया कि केवल मीठी - मीठी बातें करने वाला मित्र सच्चा मित्र नहीं होता है . 


कहानी से शिक्षा - 

१. बड़ों की बातों को मानना  चाहिए . 
२. कपटी और बेईमान मित्रों से दूर रहना चाहिए . 



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