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मातृ दिवस : माँ पर हिन्दी कविता


अपने संतानों को
आंचल में छुपाती फिरती
हर बला से दूर रखती
मां
मां
वह कोई और नही मां तुम हो।

दुख के समंदर में भी
अपने बच्चों के लिए
सुख को ढूंढ ही लेती
वह कोई और नही मां तुम हो।

कैसे पालें कैसे जिलाएं
चिंता में घुलती रहती
फिर भी सुख देती रहती
वह कोई और नही मां तुम हो ।

बाहर से थके आने पर
अपने आंचल की हवा देती
चेहरे पर फैले शिकन हरती
वह कोई और नही मां तुम हो ।

स्वयं रूखा सुखा खाती
या फिर भूखी ही रहती
पर बच्चों को भूखा नही रखती
वह कोई और नही मां तुम हो ।

सारे जहां का दुख सहती
पर हमें हर दुख से बचाती
हमेशा सुख का एहसास दिलाती
वह कोई और नही मां तुम हो ।

हमारे खातिर अपमान सहे
पर हमपर कोई आंच न आए
हर यतन करती रहती है
वह कोई और नही मां तुम हो।

प्रथम गुरु बन कर
शिष्टाचार का पाठ पढ़ाती
नैतिकता का धर्म सिखाती
वह कोई और नही मां तुम हो ।

धरती सी सहनशील होती
ममतामयी प्रतिरूप होती
आकाश सा असीम प्यार लुटाती
वह कोई और नही मां तुम हो ।



-रेणु रंजन 
(शिक्षिका ) 
रा0प्रा0वि0 नरगी जगदीश ( यज्ञशाला ) 
सरैया, मुजफ्फरपुर ।

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