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गाली गलौज 


हम रोज किसी न किसीको गाली देते हैं । बस में ड्राइवर को, आफिस में बस को, आसपास में पड़ोसियों को । नेताओं को, पुलिस को, बांग्लादेश से मैच हारने वाले भारतीय क्रिकेटरको तथा हिरण का शिकार कर जेल जाने
गाली गलौज
गाली गलौज
वाले फिल्म स्टारर्सको । सड़क पर कचरा फेंकने वाले रामबाबूको, कचरे की सफाई न करने वाले झाडूदारको, उसे देखने वाले सेनेटरी इंसपेक्टर नरेंद्रबाबूको, वार्ड के बारे में न सोचने वाले वार्ड मेंबर काबूली बाबू तथा कईं लोगोंको । तहसील आफिस में रिश्वत लेने वाले श्यामबाबूको, लोगों को ठगने वाले दुकानदार भीम साहू को , बम से रेल की पटरी उड़ाकर विप्लव करने वाले को भी गाली देते हैं हम । गाली देने के लिए क्या लोगों की कमी है इस देश में ? कि वैसी परिस्थितियों की कमी है ?

वैसे देखा जाए तो विश्व के अन्य देशों में भी वैसे लोगों की कमी नहीं अथवा परिस्थितियों की भी कमी नहीं है । इसीलिए अखबार पढ़ते-पढ़ते, रेडियो सुनते-सुनते, टीवी देखते-देखते उन्हें हम बहुत गाली देते हैं । इराक पर हमला करने वाले बुश बाबूको भी हम गाली देते हैं । परमाणु बम बनाकर रोज पूरी दुनियाको  धमकाने वाले उत्तर कोरिया को भी हम गाली देते हैं । अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए बांग्लादेश को भी गाली देते हैं । 

रोज गाली देना हमारी आदत बन गई है । जिस दिन गाली नहीं देते, उसदिन खाली-खाली महसूस होता है । हमारे इलाके में एक औरत है सभी उसे राधिदीदी कह कर बुलाते हैं । राधिदीदी रोज किसी न किसीको गाली देती है । किसी दिन अपनी पुत्र-वधूको किसी दिन बेटे को और किसी दिन पड़ोसियों को । जिस दिन कोई न मिले, उसदिन वह पांच साल पहले स्वर्गवासी हो गए पति को गाली देने में लग जाती हैं । कुत्ते-कमीने यहां मरने के लिए मुझे अकेला छोड़ गया मुझे ! अपने साथ क्यों नहीं ले गया ? अब तो तुम स्वर्ग में मजे में हो-मैं कैसी हूं तुम्हें क्या फर्क पड़ता है ? मुझे राधिदीदी के स्वर्गीय पति पर बड़ी दया आती है । वह बेचारा जीते जी कितनी गालियां सुनता होगा- अब मरने के बाद भी राहत नहीं । 
   गाली देना एक कला है । पुराने जमाने में कईं महिलाएं गाली देने का अभ्यास करती थी । हमारे पास के गांव में एेसी दो महिलाएं थीं । उन्हें गाली विशेषज्ञ माना जाता है । वह जब भी एक-दूसरे को गालियां देतीं उनकी गालियां सुनने के लिए लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाती । जैसे लोग सांड और मुर्गों की लडाई देखने के लिए इकट्ठे होते हैं । बड़ी ही अच्छी तरह से वह एक-दूसरे को गालियां देतीं थी । क्या उपमा...क्या व्यंग्य । वह गाली सुनने से पेट भर जाता । क्या एंटरमेंट होता था । 
    आजकल मध्यम वर्ग के लोग गाली-गलौज करने में थोड़ा भी पीछे नहीं हटते । मैं भी उसी में शामिल हूं । हम मुंह पर कम गाली देते हैं और पीछे ओर मन ही मन ज्यादा गाली देते हैं । डाक्टर कहते हैं, मन ही मन गाली देने पर टेंशन बढ़ता है और यह बातें तो सभी जानते हैं कि आजकल टेँशन हार्ट  अटैक और डायबिटीज का मुख्य कारण है । इसीलिए देश में डायबिटीज और हार्ट  अटैक से मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है । मनभर कर गाली देने से सारा टेँशन रिलीज । बस । मन में टेंशन रहने से यह समस्याएं हो रही हैं । 
   गाली के इन फायदों के बारे में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है । इसीलिए मेरा एक प्रस्ताव है कि साल में एक बार गाली दिवस मनाया जाए । साल भर इसे उसे गाली न देकर गाली दिवस के दिन सभीको गाली दी जाए । उसदिन गाली देने की आजादी हो । एेसा नियम हो कि उस दिन कोई किसीको कितनी भी गालियां दें उसके खिलाफ मानहानि का मुकद्दमा न हो । गाली देने की प्रतियोगिता हो । जो जिनती बुरी तरह से गाली देगा उसे पुरस्कार दिया जाएगा । पुरस्कार ग्रहण करते समय, पुरस्कृत प्रतिभा पुरस्कारप्रदाता को बहुत गालियां  दें । हर साहित्य सभाओं में गाली सम्मेलन हो । उसमें किस साहित्यकर न किसको कितनी गालियां दी हैं उस मामले में आलोचक और शोधकर्ता दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे । नेता भी एक-दूसरे को खुलेआम गाली दें। दूरदर्शन में उसे प्रसारित किया जाए । लोग टीवी देखते-देखते नेताओं को जोर-जोर से गालियां दें । अब भी दे रहें हैं । पीछे भी गालियां दे रहे हैं । गाली दिवस के दिन माइक लगाकर गाली देने की आजादी होगी । मेरा मानना हे कि एेसा होने पर भारत में मधुमेह तथा दिल के मरीज कम हो जाएंगे । अगर न हों तो मुझे जी भर के गालियां दीजिएगा।


- मृणाल चटर्जी
अनुवाद- इतिश्री सिंह राठौर





मृणाल चटर्जी ओडिशा के जानेमाने लेखक और प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं ।मृणाल ने अपने स्तम्भ 'जगते थिबा जेते दिन' ( संसार में रहने तक) से ओड़िया व्यंग्य लेखन क्षेत्र को एक मोड़ दिया ।   इनका उपन्यास 'यमराज नम्बर 5003' का अंग्रेजी अनुवाद हाल ही में प्रकाशित हुआ है । इसका प्रकाशन पहले ओडिया फिर असमिया में हुआ । उपन्यास की लोकप्रियता को देखते हुए अंग्रेजी में इसका अनुवाद हुआ है। 

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