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पिता


सन्तुलन की गाड़ी खींचते खींचते
जब एक पिता
पिता
बूढ़ा हो जाता है
इकट्ठा कर चुका होता है
अनेक लांछन
कुछ दूसरों के
कुछ अपनों के
इस प्रकार वह पक जाता है
असमय
सूखे आम के समान
अपनी खुशियों को समेटते हुए
अपनी इच्छाओं को रौंदते हुए
दूसरों के हित में डूबा
वह कर्मयोगी बन जाता है
जिसे आक्षेपों को खाने की आदत हो चुकी होती है
फिर भी थके बिना
रुके बिना
अपनी उम्र की लाठी पकड़े
इस आशा में जीता है कि -
अन्त में चार कन्धे
उसे नसीब ही हो जायेगें




डा० महेन्द्र नारायण' . लगभग ३हजार रचनाएँ सभी विधाओं में अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित मुक्ति रेखा व द्रौपदी की दुम दो कहानी संग्रह प्रकाशित प्रधान सम्पादक "प्रेरणा"(कालेज पत्रिका) पिछले २६ वर्षों से निरन्तर साहित्यिक डायरी लेखन

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  1. पिता क्या होता हैं इसे बताने के लिए शब्द काम पड़ जायेंगें, हम जगह जगह माँ के बारेमें कविताएँ, सुविचार, निबंध पढ़ते हैं लेकिन पिता पर बहुत कम पढ़े हैं. आपकी लिखी रचना बहुत ही सुंदर लगी.

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