0
Advertisement

जब सूरज जग जाता है 


आँखें मलकर धीरे धीरे
सूरज जब जाग जाता हैं ,
सिर पर रखकर पाँव अँधेरा
चुपके से भाग जाता है .
सूरज
सूरज

हौले से मुस्कान बिखेरी
पात सुनहरे हो जाते ,
डाली - डाली फुदक - फुदककर
सारे पंछी हैं गाते .

थाल भरे मोती ले करके
धरती स्वागत करती है ,
नटखट किरणें वन - उपवन में
खूब चौकड़ी भरती हैं .

कल - कल बहती हुई नदी में
सूरज खूब नहाता है ,
कभी तैरता है लहरों पर
डुबकी कभी लगाता है .

पर्वत - घाटी पार करे
मैदानों में चलता है ,
दिनभर चलकर थक जाता
सांझ हुए फिर ढलता है .

नींद उतरती आँखों में
फिर सोने चल देता हैं ,
हमें उजाला दे करके
कभी नहीं कुछ देता हैं .


- रामेश्वर कम्बोज "हिमांशु"

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top