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हम लोग


कितने बेशर्म हो गए हैं लोग
या कि चालाक हो गए हैं लोग
ख़ुशी से अपनी नाक कटवा कर
हम लोग
शहर की नाक हो गए हैं लोग |

जिसकी दीमक ने खा ली हर नेमत
ये कैसी ताक़ हो गए हैं लोग ?
गन्दगी है कसूर दरिया का
नहा के पाक़ हो गए हैं लोग |


ना सही नाम ना पते असली
भटकती डाक हो गए हैं लोग |
जरा-जरा-सी ज़िन्दगी के लिए
यहाँ हलाक हो गए हैं लोग |


ख़्वाब देखे थे आसमानों के
क्या हुआ? खाक हो गए हैं लोग!



2. निबाह


लोग कहते हैं कि वतन है मेरा
मै समझता था कत्लगाह मे हूँ

अश्क़-सा खो गया गुबारों में
राजहंस गुप्ता
राजहंस गुप्ता 
दर्द बतला गए निगाह में हूँ

जब अंधेरों को बनाया मंजिल
ठोकरें कहने लगीं राह में हूँ

न इश्क है, न आशियाना है
न किसी ख़्वाब की पनाह में हूँ

शाम हर बार मौत-सी आयी
सहर ने पाया की निबाह में हूँ



 3. हम ना ही होते!


जान पहचान की तपती सलाखों से दगा
दिल यूँ बोला कि काश सारे अजनबी होते

अपने होने की बेबसी से बहुत बेबस हो
हुआ यूँ कहने लगे काश हम नहीं होते

भटकते हर कदम से मंजिलें यूँ दूर हुईं
कि मुड़के कहने लगे काश हम वहीँ होते

सोचते-सोचते ख़ुद एक ख़याल बन बैठे
ख्याल है कि हरएक सोच से बरी होते

शायद बहुत मज़ा आता है तडपाने मे
सताते हम भी किसी को जो ज़िन्दगी होते


- राजहंस गुप्ता 

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