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गुलाब पर कविता 


हे गुलाब फूलों के राजा ,
काँटों में मुस्कारते हो .
गुलाब
गुलाब
लाल सफ़ेद गुलाबी पीले
सारे जग को भाते हो ..
डाली - डाली पर खिलकर तुम ,
सबका मन हर्षाते हो .
वन - वन बाग़ - बाग़ में हँसकर
सुन्दरता बिखराते हो ..
तितली तुम्हें देख खुश होती .

भौरे गीत सुनाते हैं .
चाँद और सूरज भि तुमको ,
देख देख सुख पाते हैं ..
काँटों में कैसे रहते हो ,
क्या मुझको बतलाओगे ?
मैं गुलाब बनकर इस जग का
सबका मन हर्षाऊँगा .
काँटों में हँसना सीखूँगा,
सबके मन को भाऊँगा ..


- श्री नर्मदा प्रसाद खरे 

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