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द्विवेदी युग
Dwivedi Yug Hindi


द्विवेदी युग Dwivedi Yug Hindi - भारतेंदु युग की कविता में आधुनिकता का समावेश भले ही हो गया था परन्तु प्राचीनता के प्रति कवियों का व्यामोह बना रहा द्विवेदी युग में आचार्य द्विवेदी के प्रबह्व से भाव पक्ष और कलापक्ष में आदर्श स्थापित हुआ और कविता में प्रौढ़ता का दर्शन हुआ .इस युग की कविता में अधोलिखित विशेषताएँ दृष्टिगत होती है - 

१. देश प्रेम -

इस युग की कविता में देश प्रेम को महत्वपूर्ण स्थान मिला है .इस युग का देश प्रेम जातीयता पर आधारित है . यह प्रेम फुटकर कवियों ,गीतों तथा प्रबंधकाव्यों में भी दिखाई पड़ता है.गुप्त जी का साकेत ,भारत भारती .हरिऔध का प्रिय प्रवास देश प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना से भरपूर है . 

२. भारत दुर्दशा - 

इस काल की कविता में वर्तमान की दयनीयता पर करुणा व्यक्त की गयी है .कवियों ने देश के अतीत गौरव को गाकर देशवासियों को जगाया और उठाया है . 

३. धार्मिक भावना - 

इस युग की कविता में धार्मिक चेतना का अभाव नहीं मिलता है .इसका अटूट विश्वास है कि ईश्वर की प्राप्ति मानवता से ही संभव है .इस प्रकार इसका ईश्वर प्रेम ,मानव प्रेम तथा विश्व प्रेम में बदल गया है .ठाकुर शरण सिंह के शब्दों में -

जग की सेवा करना ही बस है ,सब सारों का सार . 
विश्व प्रेम के बंधन ही में ,मुझको मिला मुक्ति का द्वार ..

बौद्धिकता के आग्रह से राम तथा कृष्ण का आदर्श मानव रूप में चित्रित किया गया है . 

४. रहस्यात्मकता -

इस युग की कविता में रहस्यवाद का नवीन रूप में दर्शन होता है .कवियों की समस्त प्रकृति ईश्वर की खोज में दिखाई पड़ती है - 
क्षण भर में तब जड़ में ही जाता चैतन्य विकास . 
वृक्षों पर विकसित फूलों का होता हार् विलास .. 

५. समाज चित्रण - 

द्विवेदी युग की कविता में समाज में सभी पक्षों और अंगों पर ध्यान दिया गया है . बाल विवाह ,दहेज़ प्रथा ,धार्मिक आडम्बर ,विधवा विवाह ,छुवाछुत आदि सामाजिक कुरूतियों पर कवितायें लिखी गयी . श्रीधरपाठक ने विधवाओं का दयनीय दशा का चित्र खींचा तो हरिऔधजी के विविध सामाजिक बुराईयों पर प्रहार किया . मैथिलीशरण गुप्त ने नारी उत्थान पर विशेष ध्यान दिया और काव्य रचना की .उनके अनुसार - 

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी .
आँचल में हैं दूध और आँखों में पानी ..

६. इतिवृत्तात्मकता - 

द्विवेदी युग के कवियों ने श्रृंगार रस अश्लील मानकर परिधि के बाहर रखा .ऐसी स्थिति में उनका काव्य विषय इतिवृत्तात्मकता की ओर मुड़ गया . इसके कारण युग की कविता में निरसता तथा शुष्कता आ गयी. 

७. बौद्धिकता की प्रधानता - 

इस युग की कविता बौद्धिकता से युक्त है .बिना बौद्धिकता आग्रह के भारतवासियों के मन से हीनता की भावना को निकालना संभव नहीं था .मैथिलीशरण गुप्त में राम अवतारी पुरुष न होकर आदर्श मानव रूप है .वह कोई स्वर्ग का संदेस लेकर नहीं आये हैं बल्कि धरती को ही स्वर्ग बनाने आये हैं . हरिऔध के कृष्ण और राधा भी इसी रूप में चित्रित हैं .

८. अनुदित कविता - 

द्विवेदी युग में संस्कृत और अंग्रेजी भाषा के काव्य ग्रंथों का हिंदी खड़ी बोली में विपुल मात्रा में अनुवाद कार्य हुआ है . 


इस प्रकार द्विवेदी युग के कवियों ने भारतेन्दुकालीन कवियों के अधूरे कार्य को पूरा किया .इन कवियों ने भारतेंदु युग के दोषों का निवारण तो किया ही ,साथ की राष्ट्रीयता के स्वर को ऊँचा किया .नवयुवकों में नवीन उत्साह भरकर उन्हें देश के लिए बलिदान हो जाने की प्रेरणा दी .


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