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उलझन

आकर उम्र के
इस पड़ाव पर
रूबी श्रीमाली
रूबी श्रीमाली
हमसफ़र की चाहत क्या करूँ
बरसो से शुमार है जहन में
जो तन्हाइयां हमसफ़र बनकर
कैसे अब उन्हें
महफ़िलो से रूबरू करु
कैसे फैसले कर बैठा वक्त
शिकवा अब करु भी क्या करूँ
यू तो रिश्तो के जाल
हर कदम पर फैले है
कैसे बंजर जमी
अब प्रेम सुमन खिलाएगी
कैसे रेतीली भूमि
कोई घर बनायेगी
कैसे पतझड़ में
अब बहारों की शाम गुनगुनायेगी
कैसे सिंचित हो
सुखी धरा
कैसे प्रेम बीज आरोपित हो !

                                          
    -  रूबी श्रीमाली

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