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जागृति 


सोया हुआ समाज था
सब गहरी नींद मे थे
कोई उठना नहीं चाहता था
यह जानकर कि बाहर धूप होगी
कहीं बाढ आ रही होगी
जागृति
जागृति 
और कहीं हिमपात हो रहा होगा
लेकिन समय बलवान होता है
रुकता तो है ही नही वह
चलता रहता है हर मौसम मे
आखिर समाज कब तक सोता
नींद की भी अपनी सीमा होती है
समय के धक्के से वह भी जागती है
और विशेष बात यह कि
समाज यह भारत का है
जो आदि से जाग रहा था
बीच मे सोया भी
अब जागने की बारी आयी है
यह जानकर कि अब सोना नहीं है
क्योंकि उसके सोने से
जग पतन को उन्मुख हो गया था
अब जाग रहा है समाज
लोग घरो से बाहर निकलने लगे हैं
कुछ तो राह पाने को विचरने लगे हैं
पर अभी सोकर उठ रहे है लोग
इसलिए कदाचित् कुछ भूल से गये है
कि ये हैं कौन और क्यों ?
ऐसा नहीं है कि सारा भारत सो रहा था
कुछ जाग भी रहे थे
कदाचित् तुममे से हो कोई
और वो अपना जी जान लगाकर
सोये हुए को जगा रहे थे
लेकिन अब सब स्वयं जगने लगे हैं
जगाने मे ऊर्जा नहीं खपानी
जगने वालों को केवल उनका बोध कराना है
उनको उनके उत्तर तक पहुंचाना है
क्यों सात पेड़ो के पीछे से राम ने
बालि को मारा था ?
क्यों पाकर भी माता सीता को त्यागा था ?
क्यों धंसे हुए रथ के पहिये को निकाल रहे
निहत्थे कर्ण को मारना धर्म बना था ?
क्यों अपनो से लड़ना ही कर्म बना था ?
ये वो प्रश्न हैं जो जग रहे लोग पूछेंगे
औ पूछ रहे हैं
इन प्रश्नो से यदि भागे तो
तुम्हारा सदा जगा रहना व्यर्थ होगा
अब जो नयी शक्ती बाहर निकल रही है
इसकी ही तो तुमने चाह पाली थी
यदि यह भ्रम मे आकर भटक गयी तो
केवल तुम्हारा या भारत का नहीं
पूरी मानवता का स्वप्न टूटेगा
और नाश सामने खड़ा होकर
जीवन का ग्रन्थ लूटेगा
इसलिए जग रहे हैं जो
उन्हे बताओ कौन हैं वो
क्या करना हैं उन्हे
यह बताने का क्रम तब तक जारी रहे
जब तक एक एक को बोध न हो
औ फिर सोने की बातों पर क्रोध न हो ।



           अनूप सिहं 
           बीए तृतीय वर्ष
           दिल्ली विश्वविद्यालय 

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