0
Advertisement

छोड़ अपनी पहचान 


गृहस्थी के जंजाल में पड़कर,
दोस्ती अक्सर भूल जाते हैं
जीवन के जंजाल
बचपन में  एक दूजे के पीछे,
वो कितना दौड़ा करते हैं ।
चढ़ जवानी दहलीजे,
अक्सर भूल ही जाते हैं
रोटी की तलाश में फिरते,
कितनी मेहनत करते हैं ।
जीवन के कटु सत्य को,
कहां पहचान पाते हैं
भगदड़ की इस जीवन में,
बस भागे से फिरते हैं ।
रोजी रोटी के चक्कर में,
खुद को भी भूल जाते हैं
आंखों के जो सपने होते,
उनके पीछे ही पड़ते हैं ।
जीवन के चक्रव्यहू में,
यहां-वहां भटके जाते हैं
अपनों के खातिर ही तो,
अपने ही तो लड़ते हैं ।
दोस्तों की गिनती तो,
खुद कम करते जाते हैं
और दुश्मनों में इजाफा,
हर रोज ही तो करते हैं ।
जिनको भी छोड़ना होता,
उन्हें पकडे जाते हैं
जिनको पकड़ना होता,
उन्हें छोड़े ही रहते हैं ।


जीवन के जंजाल में,
क्या-क्या कर जाते हैं
कमलेश संजीदा
कमलेश संजीदा
दुश्मन को भी दोस्त बना,
धोखा खाते रहते हैं ।
अपनीं–अपनीं खूब चला,
मोहरे बनते जाते हैं
आगे पीछे दुम हिला कर,
कुत्ते से बनते रहते हैं ।
खोकर अपनी ही मर्यादा,
सबकुछ भूल जाते हैं
छोड़ अपनीं पहचानों को,
उनकी बनाते रहते हैं ।
ऐसे तो खुद कुछ कहाँ,
जीवन में पा ही पाते हैं
रात-रात भर भी जगते,
खुद पहचान भुलाते रहते हैं ।




- कमलेश संजीदा उर्फ़ कमलेश कुमार गौतम 
गाज़ियाबाद,उत्तर प्रदेश
Email. kavikamleshsanjida@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top