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अगले जन्म मोहे बेटी ही कीजो 


तपस्या यही नाम तो रखा था उसकी नानी ने। तप कर खरा सोना बनने वाली लड़की। तपस्या जब पैदा हुई थी तो उसकी माँ सुधा अस्पताल में जार जार रो रही थी। आखिर तीसरी बेटी थी। कुछ दिन की तपस्या अपनी माँ को
बेटी
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टुकुर टुकुर देख रही थी। सुधा का  रो रो के बुरा हाल था "माँ अब क्या होगा "सुधा अपनी माँ से लिपट कर रोने लगी।
कुछ नहीं बेटा सब ठीक हो जायेगा बेटियां तो लक्ष्मी होती हैं "सुधा की माँ ने उसे सांत्वना देने की कोशिश की। 
"नहीं माँ सब लुट गया बर्बादी हो गई अब उस घर के दरवाजे मेरे लिए बंद हो गए "सुधा न बिलखते हुए कहा "माँ जी ने स्पष्ट कहा है अगर पोते को गोद में नहीं लाई तो दरवाजे पर कदम मत रखना "अब मैं क्या करूँ माँ " सुधा ने बड़े कातर स्वर में कहा। 
"बेटा तू चिंता मत कर जब तक तेरा बाप जिन्दा है तुझे चिंता की आवश्श्यकता नहीं है "सुधा के पिता ने बहुत प्यार से समझाया। 
आखिर वही हुआ जिसका सुधा को डर था उसकी सास ने लड़ झगड़ कर सुधा को अपनी तीनो बेटियों के साथ उसके मायके भेज दिया। सुधा का पति भी असहाय नजर आया क्योंकि वो भी पूरी तरह अपने पिता पर आश्रित था। समय बीतता गया बेटियां बड़ी होती गईं। तीनों पढ़ने में बहुत होशियार थीं स्कालरशिप के सहारे और सुधा की प्राइवेट ट्यूशन के सहारे बड़ी बेटी बैंक में उच्च अधिकारी बनी मंझली बेटी इंजीनियर बन गई और छोटी तपश्या का आज संघलोक सेवा आयोग का रिजल्ट आना था। 
सुधा बहुत बेचैन थी "टप्पी क्या होगा बेटा "
"कुछ नहीं माँ मैं पास होउंगी  आप चिंता मत करो "तपश्या ने बहुत आत्म विश्वास के साथ कहा। 
और जैसे ही रिजल्ट आया पूरे शहर में  ख़ुशी की लहर दौड़ गई तपश्या ने पूरे भारत में तीसरी रेंक बनाई थी। 
तपस्या के नाना नानी सुधा और सब शहर वालों का घर पर बधाई देने का ताँता लगा था। 
सुधा बहुत खुश थी किन्तु आज भी उसकी ख़ुशी अधूरी थी। वह चाहती थी कि इस मौके पर तपश्या के पिता और दादा दादी साथ होते किन्तु तपश्या ने अपनी माँ के सतह जो व्यवहार हुआ था उससे वह बहुत दुखी थी और उसने माँ से वचन ले लिया था कि वह अब अपने पिता और दादा दादी से कोई सम्बन्ध नहीं रखेगी। इस कारण सुधा चुपचाप थी वह इस ख़ुशी में बाधा नहीं डालना चाह  रही थी। 
उधर जब तपश्या के दादा दादी और पिता ने सुना की उनकी बेटी कलेक्टर बन गई तो उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था किन्तु अब वो किस मुंह से सुधा के सामने जाएँ यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा था। 
आखिर तपश्या की पोस्टिंग कलेक्टर के रूप में हो गई। आज उसकी शादी है  उसका पति अमित भी कलेक्टर था दोनों की बहुत प्यारी जोड़ी थी बहुत सारे मेहमान जुड़े थे मुख्यमंत्री से लेकर सारे मंत्रियों को निमंत्रित किया गया था। बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। तपश्या का पिता और दादा दादी बाहर खड़े थे लेकिन कोई उनको अंदर नहीं जाने दे रहा था आखिर निराश होकर तीनो लौटने लगे तभी छत से सुधा की नजर पड़ी उसकी आँखे छलछला आईं वह बाहर की और दौड़ी और उसने सुरक्षा कर्मियों से तीनों को अंदर बुला लिया। 
कमरे में घुसते ही सुधा ने अपने सास ससुर के पैर पड़ने आगे बढ़ी सास ने उसे गले लगाते हुए कहा "बहु हम इस लायक नहीं की तुम हमारे पैर पड़ो हम आज तुम्हारे पैर पड़ कर माफ़ी मांगते हैं हमने जो दुर्व्यवहार तुमसे और बेटियों से किया है उसके लिए माफ़ी के हकदार तो हम नहीं हैं लेकिन हो सके तो हमें माफ़ कर देना "
नहीं माँ जी ये तो भाग्य का खेल है मेरे मन में आपके प्रति उतनी ही श्रद्धा है आप की तीनो बेटियों ने आपके कुल का नाम रोशन किया है "सुधा ने अपन सास ससुर को पूरा सम्मान देते हुए कहा। 
उधर मंडप से बुलावा आ गया की बेटी के माँ बाप को बुलाओ कन्या दान करना है। 
सब लोग बड़े विस्मय से देख रहे थे की तपस्या के दादा और दादी सज संवर कर तपस्या का कन्या दान करने मंडप में पहुंचें। तपस्या ने सुधा की और प्रश्नवाचक दृष्टी से देखा लेकिन सुधा के चेहरे पर सुख और संतुष्टि के भाव देख कर तपश्या भी प्रसन्न हो गई ,
तपश्या को आज एक बेटी होने का गर्व महसूस हो रहा था उसके कारण आज उसका परिवार एक हो गया , समाज में उसके कारन उसके परिवार और रिश्तेदारों का सम्मान बढ़ गया। 
उसके मन में आज यही विचार आ रहे थे "अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो '
सुधा ,उसके पति एवं सास ससुर भी सोच रहे थे की उनकी बेटियों ने उनको धराल से आसमान पर पहुंचा दिया। एक ही प्रार्थना वो ईश्वर से  कर रहे थे  "हे ईश्वर अगले जन्म मोहे बेटी ही दीजो। "


- सुशील शर्मा 

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