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संवेग और दायित्व के जद्दोजहद की कहानी है 'यमराज नम्बर 5003'

इंसान तो भावुक होता ही है लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि यमराज भावावेश में आकर किसीको जीवनदान दे दें । यमराज का नाम सुनने ही शरीर कांपने लगता है लेकिन एक एेसा भी यमराज है जो इंसानों की तरह सोचता है और इंसानों की तरह प्यार भी करना जानता है । यह कहानी है मृणाल चटर्जी की उपन्यास 'यमराम नम्बर 5003' की । आप सोच रहे होंगे कि यमराम तो यमराज है तो फिर यह 5003 क्या होगा । यह तो आपको किताब पढ़कर ही पता चलेगा ।

किताब का सारांश - 

यमराम नम्बर 5003
यमराज नम्बर 5003
दुनिया की आबादी 600करोड़ से भी ज्यादा है । तो एक यमराज के लिए संभव नहीं कि वह सभी मृत इंसानों की आत्मा यमलोक ला सके । इसीलिए ब्रह्माजी ने  यमराज का क्लोन बनाया । उसमें से 'यमराम 5003' सबसे थोड़ा अलग था । ब्रह्मा जब इस यमराज को आकार दे रहे थे तभी देवी सरस्वती ने उन्हें बुलाया और वह चले गए । तभी वहां नारद मुनि पहुंच कर  एक मानव का ब्रेन सेल 'यमराज नम्बर 5003' में लगा दिया जोकि एक कवि था । श्रृंगार रस का  कवि । उसकी मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई । उसी 'यमराज नम्बर 5003' को सुमति सामंत नामक लड़की की आत्मा लाने को कहा गया। वह ट्रेन के सामने आकर आत्महत्या करने वाली थी लेकिन उसके प्रेमी सुब्रत ने यमराज से सुमति का जीवनदान मांगा । लेकिन यमराज जीवनदान नहीं देते वह तो जीवन लेते । यह उनके सिद्धांतों के खिलाफ है । तो क्या 'यमराज नम्बर 5003' सुमति को जीवनदान देता है ? उसके बाद इंसानी दिमागवाले इस यमराज का क्या होता है ? इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए आपको किताब पढ़नी पडे़गी । 

चरित्र -चित्रण - 

लेखक ने बड़ी ही बखूबी से किरदारों की रचना की है । भले ही यह कहानी 'यमराज नम्बर 5003' के इर्द-गिर्द घूमती हो लेकिन सुब्रत, सुमति, चित्रगुप्त, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, नारद, यमदूत जैसे रोचक किरदार भी हैं ।  लेखक ने संतुलन बनाते हुए स्थिति के अनुसार सभी किरदारों को तवज्जों दिया है । इन चरित्रों के बारे में पढ़ते ही मन में उनकी एक छवि बन जाती है जो कि लेखकीय सफलता है । 

मेरे विचार - 

कहानी की रोचकता को देखते हुए लेखक आखिर तक पाठकों को बांध कर रखने में कामियाब होते हैं । कहानी नई है । इसे पढ़ते हुए आपको फिल्म 'लोक-परलोक' की याद आएगी । लेकिन जब आप इसकी कहानी से रूबरू होंगे तब आपको पता चलेगा कि यह कहानी उस फिल्म की कहानी से पूरी तरह अलग है । 

पुस्तक समीक्षा
लेखक-मृणाल चटर्जी
अनुवाद- थिरुमोय बनर्जी
प्रकाशक- रूपा प्रकाशन
- इतिश्री सिंह राठौर

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