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वक्त के आईने में


वक्त के आईने में आज बदल जाए..
दर्द के रूबरू में साज बदल जाए.

मैं तुम्हें हाशिल कर लू़ंगा इंतजार करना...
बस चाहता हूं ये समाज बदल जाए.
वक्त के आईने में
वक्त के आईने में

हम तुम्हें पुकारेगें इक रोज तेरे गली में...
बस दुनिया की आवाज बदल जाए.

हम बदनाम सही इंतजार है उस दिन का...
बस शोहरते चेहरों का राज बदल जाए.

हम लिखेगें तेरे दर्द की इबारत बाशर्ते...
इतिहास के कुछ कागज बदल जाए.


हम भी जिन्दगी में 

जमानें की हर जख्म सहने का शबाब रखते है..
तेरे हरएक जाम का हम शराब रखते है़.

तुम्हें देगें हर खुशी उसके बराबर निगाह रखना..
अपनें आँगन में तेरे लिए महताब रखते है.

मौका मिले तो बदल देगें हम सारी कायनात..
कुछ ऐसा ही हम आंखों में ख्वाब रखते है.

कुछ छुपा भी नही है हकीकत हमसे सरकार..
तुम्हारे हरएेक सवालों का जवाब रखते है.

इक तुम्ही नही जमानें के सताये हुऐ महजबी..
हम भी जिन्दगी में गमों का सैलाब रखते है.


यह रचना राहुलदेव गौतम जी द्वारा लिखी गयी है .आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है . आपकी "जलती हुई धूप" नामक काव्य -संग्रह प्रकाशित हो चुका  है .संपर्क सूत्र - राहुल देव गौतम ,पोस्ट - भीमापर,जिला - गाज़ीपुर,उत्तर प्रदेश, पिन- २३३३०७
मोबाइल - ०८७९५०१०६५४                           

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