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सह लेती है

धूप में
बहाती पसीना
एक बच्ची
कूड़े के ढेर पर
शायद वह बीन रही
कचरा,
कमाना चाहती है
रूपये पैसे
मिटाना चाहती है
बेरहम भूख को
ताकि सुकून मिल सके
भूखी माँ को
क्योंकि पिता रोज पी दारू ?
उठाते हाथ।
माँ गरीब सह लेती है
हँसती सुबह शाम
रख हाथ पेट पर
सब्र कर लेती है
अंदर ही अंदर आँसू पी ,
मुस्कुराती बातें कर लेती है
किंतु नहीं समझ पाते
पिता
आखिर उसकी पत्नी
क्यों और कैसे?
सह लेती है
रह लेती है।




 रचनाकार परिचय अशोक बाबू माहौर
साहित्य लेखन :हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में संलग्न।
प्रकाशित साहित्य :हिंदी साहित्य की विभिन्न पत्र पत्रिकाएं जैसे स्वर्गविभा, अनहदक्रति, साहित्यकुंज, हिंदीकुुुंज, साहित्यशिल्पी, पुरवाई, रचनाकार, पूर्वाभास, वेबदुनिया, अद्भुत इंडिया, वर्तमान अंकुर, जखीरा, काव्य रंगोली आदि में रचनाऐं प्रकाशित।
सम्मान :इ- पत्रिका अनहदक्रति की ओर से विशेष मान्यता सम्मान 2014-15
नवांकुर वार्षिकोत्सव साहित्य सम्मान
काव्य रंगोली साहित्य भूषण सम्मान आदि
प्रकाशित पुस्तक :साझा पुस्तक नये पल्लव 3
अभिरुचि :साहित्य लेखन।
संपर्क :ग्राम कदमन का पुरा, तहसील अम्बाह, जिला मुरैना (मप्र) 476111
मो 8802706980
ईमेल ashokbabu.mahour@gmail.com

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  1. दिल भर आया. माँ पर आपने अत्यंत ही ह्रदयस्पर्शी कविता लिखी हैं आपने.

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