0
Advertisement

कर्मवीर


ओ कर्मवीर धीर नर बोल मत
काल परिणाम मात्र मांगता

धरा के गर्भ मे अभी शेष रत्न कोष है
खोजता गर नहीं तो ये मनुष्य दोष है
कर्मवीर
कर्मवीर
समस्त भूमिलोक मरु हुआ है कहां अभी
जो तू खड़ा है भिक्षु बन नभ को निहारता

बह रही सरित यहां समस्त प्यास नाश को
सर्व बूंद देय है सृष्टि के विकास को
नर करे प्रयोग अब नीर कोश युक्ति से
क्यों प्रतीक्षारत स्वतः क्रिया पुकारता

गयी कई सदियां शांति के विमर्श मे
हारकर लड़ा मनुष्य युद्ध को अमर्ष मे
ध्येय के बिना लड़ा बार बार युद्ध को
इसलिए मनुष्य ही मनुष्य को है मारता

नियति चाह राह मे जो विपद् प्रचंड है
विश्व के विकास को वही तो एक दंड है
बुद्धि का धनी मनुष्य लड़ रहा है दृश्य से
उचित शत्रु है कहां पर नहीं वो जानता

हर तत्व प्राप्ति योग्य औ त्याज्य भी
संभव है होना साकार राम राज्य भी
कल्पना की पूर्ति तो मात्र एक चाह है
रहेगी अपूर्ण ही नर अगर न ठानता

                  - अनूप सिहं 
                बीए तृतीय वर्ष 
               दिल्ली विश्वविद्यालय 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top