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धरती पर सर्जन ही धन है  


गाओ जितने गौरव गान
सभी मे है कर्मो का भान
सर्जन
साक्ष्य अनेको गत से अब तक
धरती पर सर्जन ही धन है

युद्घ भीति की आभा सम्मुख
जन सामान्य सब नत होते है
कुछ को युद्घ नाश का सूचक
कुछ तो बीज स्वयं बोते है
नही युद्घ रचना का साधन
उसमे भीषण ध्वंस पड़ा है
पर कहां अमर वह भी है जो
स्वयं युद्घ मे नही लड़ा है
मत छोड़ो धनु औ बाण
न त्यागो कर की कठिन कृपाण
गत के सारे सत्य यही है
युद्घो मे गर्जन जीवन है

आग लगी है तत्व राख को
जलने दो फिर पूरे बल से
फैले खूब लपट इच्छा भर
सीमित करो उसे मत जल से
तत्व वही अस्तित्व है जिसका
रूप राख का कब वह लेगा
जलकर गलकर अग्नि द्वार से
होकर शुद्ध स्वयं निकलेगा
जिसकी यह हुंकार
कि है जो तपने को तैयार
ध्येय प्राप्ति मे परिशोधित हो
कलुष त्यागना ही सृजन है

प्रलय प्रकोपित मग मे सारे
आपस मे ही होड़ लगाते
नाश द्रोह औ ध्वंस विपद् को
विधि बंधन को तोड़ जगाते
समय तय नही है कुछ भी
हर क्षण संकट की भीति है
जल मे थल मे और पवन मे
संघर्ष प्रगति की रीति है
पथ कंटक हो चलो चलो
तमिस्त्रा मध्य स्वयं जलो
मृत्यु तक के हर क्षण मे
प्रतिकूल परिस्थिति से लड़ना
जीवन है ।

                              अनूप सिहं 
                              बीए तृतीय वर्ष 
                             दिल्ली विश्वविद्यालय 

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  1. बहुत सुंदर रचना...बहुत सुंदर...अनूप जी को बधाई...
    डॉ राजीव रावत
    आईआईटी खड़गपुर

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