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आत्‍मकथ्‍य जयशंकर प्रसाद 
Aatmkathya by jaishankar prasad


मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत नीलिमा में असंख्य जीवन इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य मलिन उपहास
तब भी कहते हो कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे यह गागर रीती।
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

व्याख्या - कवि कहता है कि मन रूपी भंवरा गुनगुनाकर कह रहा है कि अपनी जीवन गाथा कैसे कहूँ ? कवि के जीवन की इच्छाएं एक एक करके पत्तियों की तरह मुरझाकर गिर गयी . उन्होंने एक एक करके अपने जीवन के सपनों को मरते देखा है . दुःख झेला है .इस विशाल नीले आकाश में रहने वाले कितने महापुरषों ने अपने जीवन का इतिहास लिखा है .उन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि मानों वह अपना ही उपहास कर रहे हैं . कवि का जीवन अभावों और कठिनाइयों से भरा पड़ा है . अब कवि के मित्र कहते हैं कि वह अपने जीवन की गाथा लिखे .कवि की कहानी जानकार उन्हें क्या सुख मिलेगा . वह तो खाली गागर के समान है . उसके जीवन के खालीपान को देखकर किसी को कोई सुख नहीं मिलेगा . 

यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों को दिखलाऊँ मैं।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिलाकर हँसते होने वाली उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

व्याख्या - कवि कहता है कि मैं अपने सरलमन की हँसी नहीं उदौंगा .मैं मन की कमजोरियों को सबके सामने क्यों प्रकट करूँ . मेरे जीवन में जो भी मधुर चाँदनी राते आई थी ,वे सब चली गयी .वे सब मेरे जीवन की निजी अनुभूतियां है . अपनी प्रियतमा के साथ निजी क्षणों को क्यों सबके सामने प्रकट करूँ .कवि कहता है कि वह स्वप्न देखकर जो जागा था ,वह प्रियतम कहाँ मिला . जिस प्रियतमा का आलिंगन करने के लिए उसने बाहें आगे बढ़ाई थी ,वह प्रियतम दूर भाग गया . वह प्रियतम कवि को कभी नहीं मिला . 

जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनि उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

व्याख्या - कवि अपनी प्रियतमा के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहता है कि उसकी प्रेमिका के लाल कपोल उशाकालीन लालिका से भि अधिक मनोरम है . कवि उसकी यादों का सहारा लेकर जीवन के थकान को दूर करता है .कवि के जीवन में कभी सुख के पल कभी नहीं आये ,जिन्हें वह आमजनता को बता सके .आमलोग क्यों उसकी आत्मकथा क्यों जानना चाहते हैं .कवि कहता है कि उसके लिए यही अच्छा रहेगा कि वह दूसरे महान लोगों की गाथाएँ सुने और अपनी व्यथा को लेकर शांत बना रहे . मेरी भोली आत्मकथा को सुनकर कोई प्रेरणा प्राप्त नहीं करेगा .कवि का मन शांत है .उसने जीवन में ऐसी कोई महानता अर्जित नहीं की है ,जिसके बारे में लिखा जाय .अतः अभी कवि अपनी आत्मकथा को लिखना नहीं चाहता है . 

NCERT Solutions for Class 10th पाठ 4 आत्मकथ्य प्रश्न अभ्यास 


प्र.१. कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?

उ.१. कवि का मानना है कि उसका जीवन अभावों और दुर्बलताओं से भरा हुआ है . उसने जीवन में ऐसी कोई उपलब्धि भि नहीं प्राप्त की है कि वह दुनिया को प्रेरणा दे सके .अतः वह निजी अन्तरंग क्षणों को सार्वजनिक नहीं करना चाहता है . यही कारण है कि वह आत्मकथा से बचना चाहता है . 

प्र.२. आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ‘अभी समय भी नहीं’ कवि ऐसा क्यों कहता है?

उ.२. कवि के जीवन के पुराने घाव फिर से हरे -भरे हो जायेंगे . उसकी मन की दुर्बलताओं ,भूलें और कमी किसी एनी को प्रेरणा देने के लिए प्रयाप्त नहीं है . अतः अब वह चुप रहकर अन्य व्यक्तियों के कथाओं को सुनकर चुप रहना चाहता है . 

प्र.३. स्मृति को ‘पाथेय’ बनाने से कवि का क्या आशय है?

उ.३. पाथेय का अर्थ मार्ग में मिलने वाले भोजन या संबल से है . अतः कवि अपनी प्रियतमा की यादों के सहारे अपने जीवन की थकान को दूरकर रहा है . 

प्र.४.भाव स्पष्ट कीजिए:
१.मिला कहाँ वह सुख जिसका स्वप्न देखकर मैं जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर के भाग गया।

उ.४. १. कवि कहता है कि जिसका स्वप्न देखर वह जागा था .वह कवि के आलिंगन में आने के पहले ही भाग गया . 
२.जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिणी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

उ.२. कवि की प्रियतमा बहुत सुन्दर थी . उसकी प्रेमिका के लाल कपोल उषाकालीन लालिमा से भी अधिक मनोरम थे . 

प्र.५.‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’ – कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

उ.५. कवि अपने जीवन के मधुर क्षण व अन्तरंग क्षणों को सबके सामने प्रकट नहीं करना चाहता है .उसकी प्रियतमा बाहों में आने के पहले ही उससे दूर हटकर चली गयी . अतः मधुर चाँदनी रातों को यादकर रोना उसके जीवन का प्रारब्ध बन गया है . 

प्र.६.‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

उ.६. जयशंकर प्रसाद के छायावाद के प्रवर्तक कवि है . उन्होंने आत्मकथ्य कविता में सरल ,खड़ी बोली तथा अलंकारों का उचित प्रयोग किया है . मानवीकरण द्वारा अपनी बात पाठकों तक पहुँचाई है . इस कविता में मधुप ,नीलिमा ,चाँदनी रात आदि प्राकृतिक उपमानों का सुन्दर प्रयोग किया गया है .कविता में गेयता और छंद बद्धता है . 

प्र.७. कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?

उ.७. कवि ने स्वप्न में अपनी प्रियतमा को आलिंगनबद्ध करते देखा था .वह स्वप्न में ही मधुर चाँदनी रातों की कल्पना करता है लेकिन स्वप्न में देखे गए सपने कभी पूरे नहीं हुए .जागने पर प्रियतम कवि के पास आने से पहले ही जा चुका था .अतः कवि का स्वप्न अधूरा ही रह गया . 

रचना और अभिव्यक्ति


प्र.८. इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तिव की जो झलक मिलती है ,उसे अपने शब्दों में लिखिए . 

उ. ८. कवि अपने  जीवन के आत्म कथा को बताना नहीं चाहते हैं .मित्रों के आग्रह पर वह प्रस्तुत कविता के माध्यम से अपनी व्यथा को सामने रखते है.जीवन के यथार्थ एवं अभाव पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति की है .कवि के जीवन की कथा एक सामान्य व्यक्ति के कथा है ,ऐसा इसमें कुछ नहीं है जिसे लोग सुनकर वाह - वाह करे . इस कविता को पढ़कर हम कवि के यथार्थ और महान व्यक्ति के विनम्रता से परिचित होते है . 



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