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समर्पण 


मुग्ध होती हूं तेरी मीठी-मीठी
होठों की मुस्कान देखकर,
समर्पण
नींदो में मेरे तुम आना रोज
हसीन-हसीन ख्वाब बनकर ।
तेरी हर अदा से भर जाती
मेरे मन की सारी उरियां,
मिट जाती है तब दिल से
दिल की सब दूरियां ।
तेरे बिना मेरा अस्तित्व कहां
जीवन है तुझमे घुलमिल,
तुमसे सराबोर होकर मेरा जहां
है पल-पल झिलमिल ।
मेरे जीवन का प्राण-वायु
तुझसे तन-मन झंकृत ,
तुम जब होते हो आसपास
होता अंग-अंग अलंकृत ।
गुलशन बहार बनकर तुम
फैलाते हर ओर सौरभ,
साथ हरपल निभाकर तुम
बढ़ाते जग में मेरा गौरव ।
बढ़े मेरा सम्मान जगत में
करते अपना पल-पल अर्पित
हे प्रिये तुम हो सौगात ईश्वर की
करती तन-मन तुझे समर्पित ।



रचनाकार परिचय - 
रेणु रंजन
(शिक्षिका )
रा0प्रा0वि0 नरगी जगदीश 'यज्ञशाला'
सरैया, मुजफ्फरपुर  (बिहार)
मो0 नंबर - 9709576715


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