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तेरा दिल मेरे लिए दिवाना हो


आरजू थी तन्हा सा इक आशियाना हो!
तेरा दिल मेरे लिए दिवाना हो
तेरा दिल मेरे लिए मेरा तेरे लिए दिवाना हो!

हमारी चाहत में वो शिद्दत नही थी दोस्त,
जो किसी के लिए नया फसाना हो!

तेरे बगल में डर ना हो ना मेरे बगल में,
बस मयकशी ही मयकशी का ठिकाना हो!

जिन्दगी कट जाए इन्ही दोनों के दरम्यान,
सुबह खुदा के घर शाम तेरे आगोश में बिताना हो!


तेरे घर का पता

इस जिन्दगी कि शाम कुछ शहर सी है!
जिसे देखती हर पल कुछ नजर सी है !

ये शाम हमें मदहोशी की दावत देती है,
लेकिन पीने में क्यों यह जहर सी है!

तेरे घर का पता हम पूछ लेगें मोहब्बत,
मेरे लिए यह कोशिश अनजाने डगर सी है!

मधुमेह की बीमारी मुझे जन्मजात है यार ,
तेरी जिन्दगी मेरे लिए शक्कर सी है !

कुछ में फेल हो जाते है कुछ में पास,
जिन्दगी की इम्तिहान भी सेमेस्टर सी है !


यह रचना राहुलदेव गौतम जी द्वारा लिखी गयी है .आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है . आपकी "जलती हुई धूप" नामक काव्य -संग्रह प्रकाशित हो चुका  है .
संपर्क सूत्र - राहुल देव गौतम ,पोस्ट - भीमापर,जिला - गाज़ीपुर,उत्तर प्रदेश, पिन- २३३३०७
मोबाइल - ०८७९५०१०६५४

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