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नारी तू अबला नही

सृष्टि की सुंदर रचना
नारी तन जो मिला,
नारी
नारी 
कभी मां पद पर सुशोभित,
कभी बेटी बनकर चर्चित,
कभी पत्नी बनकर
पग-पग साथ निभाती,
कभी भाभी का रिश्ता जोड़ती,
कभी दादी-नानी कहलाती,
जाने क्या क्या रिश्ते बनाती,
इन रिश्तों में उलझी बिखरी
नारी खुद न निखरी,
कोख में अपने, पलती नारी को
डर के साए में,
बाहरी झमेलों से तंग ,
रिश्ते नातों के तानों से,
खुद को कमजोर समझ
बहा आती नाली में।
हे नारी! तू अबला नही सबला है,
ताकत इतनी है कि
इतिहास बदल सकती है,
फिर आसक्ति के आड़ में
अपने ही वजूद को क्यों मिटाती है ।
सोचा कभी यह,
यदि धरा पर नारी नही
तो क्या सृष्टि में
मानव जीवन संभव है ?

रचनाकार परिचय
रेणु रंजन
(शिक्षिका )
रा0प्रा0वि0 नरगी जगदीश 'यज्ञशाला'
सरैया, मुजफ्फरपुर  (बिहार)
मो0 नंबर - 9709576715

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