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क्या मैं जिंदा हूँ 

आत्मा में खरोंचें हैं
पैरों में विबाईयाँ हैं
मेरी आँखों में जलते चरागों में
एक प्रश्न लहराता है
एक प्रेत की तरह
क्या मैं जिन्दा हूँ।

मैं अन्दर से तिलमिलाता हूँ
आत्मा
और बाहर से खिलखिलाता हूँ
अपनी शवयात्रा में न जाने
कितनी बार शामिल होकर
फिर सोचता हूँ क्या मैं जिन्दा हूँ।

मेरे अंदर का साहस कहता है ...
मैं मरने से नहीं डरता
मर चुका आदमी भला
मरने से डरेगा भी क्यों ?
मर चुकी सारी संवेदनाये
ढो रही हैं इस जीवित शरीर को।

मर चुके सारे प्रश्न
सुबूत हैं मेरी लाश के
क्योंकि प्रश्नों में जीवन छुपा है
प्रश्नों ने ही रची होगी
वाक्य,बोलियां और भाषाएं
स्वर ,व्यजंन ,अक्षर
सभ्यताएं और संस्कृतियां
और जब ये प्रश्न मर गए
तो क्या मैं जीवित बचा।

अबोधों की बस्तीयों पर
सिद्धों की नज़र गिद्ध सी है.
आदमी किश्तों में मर रहा है
फिर भी ज़िंदा घोषित है।
इसीलिए अब बाहर कोलाहल
अन्दर सन्नाटा है."

 मैं खुद के लिए तो कभी का मर चुका हूँ
तुम्हारे लिए गर ज़िंदा हूँ तो तलाश लो।
अपने वीराने में मिलूंगा तुम्हे थोड़ा सा जिन्दा।
वर्ना मैं तो  मर तो गया था बहुत पहले।
इस कदर मेरा बिखरना और क्या है?
श्मशानों का सहरना और क्या है ?
पर सुना है मैं सांस लेता हूँ अभी भी
रिश्तों  का मन रखने को हंसता हूँ अभी भी।
मरने के बाद भी जिन्दा दिखता हूँ अभी भी।

सभ्यता के सवालों का जबाब कौन देगा ?
मेरे जिन्दा होने का सुबूत कौन देगा?
सपने जो खो गए हैं रात के अंधेरें में
उनकी शिनाख्त किस सुबह होगी।
हर कोई बुद्ध बना बैठा है यहाँ गिद्ध नजर लेके
हर शातिर खोल कर बैठा है
शांति की पाठशाला
हर हकीकत खड़ी है चौराहे पर
सत्य गुमनाम सा गटर में बहता है।
और झूठ मांगता है सत्य से प्रमाण
बताओ की तुम जिन्दा हो।

ख्वाब और .ख्वाहिशें हमशक्ल सी मेरी
बिखर जाती हैं शब्द की स्याहियों सी ?
खेतों में अब शहर बसने लगें हैं।
गुलशनों को अब वीराने डसने लगे हैं।
यह सड़कें अब गुजर रहीं है
रिश्तों के मकानों से।

दर्ज है एक दर्द सुबह के अखबार में
सुना है उसको मैंने लिखा है।
शब्दों को बहुत समेटा मैंने
पन्नों पर बिखरें है आंसू जैसे।


आत्मा की अर्थीयाँ ढो रहे हैं लोग यहाँ पर।
जिंदा शरीर की ठठरियों पर।
जिन्दगी को नुमाइश बनाने वालों।
देह से होकर गुजरते रास्ते रिश्ते नहीं हो सकते।
आत्मा को जिंदा करना है तो
मौत का डर मन से निकालो पहले।
कितने प्रश्नचिन्ह मेरे जिंदा होने पर हैं।
उतने ही उत्तर मेरी मौत संभालें होगी।

- सुशील शर्मा

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