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 उस दिन

आज होता इस रिश्ते का भी कोई नाम
अगर उस दिन न होता मुझसे वह काम 
गलती थी मेरी बस इतनी 
किया था तुझपे विश्वास
बार-बार मन के न कहने पर भी
चली गयी तेरे साथ
हुई उस दिन मैं बदनाम
तृष्णा सागर
तृष्णा सागर
दिया बेवफा सबने मुझको नाम ।
आज होता इस रिश्ते का भी कोई नाम
अगर उस दिन न होता मुझसे वह काम
बता सबको वफ़ा तो तूने भी न निभाई
किया हमारे रिश्ते को आम
जिसे रखना था दिल मे संभाल 
किया उसे तूने सरे आम
दी तूने मुझको दुहाइयाँ
नहीं कहना यह सबको 
खूब समझाया तूने मुझको 
नहीं कहना यह सबको 
कि बनाएंगे लोग बातें चार
करेंगे खड़ी हमारे बीच दीवार
कहाँ गयी थी उस दिन तेरी यह समझदारी
जब किया सबने मिलकर मुझे ज़लील
क्या मिला उस दिन तुझको या मुझको 
माफ करना पर नहीं भूल पाउंगी उस दिन को
जब आज छोड़ रही हूं तेरा साथ 
तो क्यों रोए पकड़ कर हाँथ
तब क्यों नहीं सोचा क्या होगा इसका परिणाम
एक औरत सुन सकती है सब कुछ 
बस नहीं सुन सकती चरित्रहीन खुद को ।
आज होता इस रिश्ते का भी कोई नाम
अगर उस दिन न होता तुझसे वह काम 
बस अब और नहीं बहुत निभाया मैंने प्यार
डाली सब पर मिट्टी आज
कर दिया दफ़न उन बुरी यादों को
कोशिश करूँगी याद रक्खूं कुछ अच्छे पलों को
अब चाहे कहो बेवफा चाहे करो बदनाम।

                                       --तृष्णा सागर

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  1. तृष्णा जी,
    यह कविता नहीं, मन की गहराइयों से आ रही आवाज है. आप सदा खुश रहें . लिखने की कला को जगाए रखिए. आप में सामर्थ्य है.
    अयंगर
    laxmirangam.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं

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