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साहित्य की चोरी कभी नहीं होती 

साहित्य
साहित्य
जब किसी भौतिक वस्तु को चुपचाप बिना संज्ञान अपना बनाने के इरादे से ले लिया जाए तो उसे कहते हैं 'चोरी' और जब स्व-विक्षिप्तता को पोषित करने के लिए किसी की आत्मा को छिन्न भिन्न कर जबरन संवेदनाओ का शोषण किया जाए तो वो हुआ 'बलात्कार' ।

कुछ वक्त पहले 'अमृता प्रीतम' की कविता पढ़ते हुए वी़डियो बनाया था, बाद में पता चला कि वो कविता जो सोशल मीडिया में अमृता जी के नाम से छायी हुई थी वो उनकी थी ही नहीं, 'शरद कोकास जी' की है ।

YouTube पर मोदी जी का एक भाषण है जिसमें उन्हें 'वाजपेयी जी' की लिखी कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं, 'ना हार में ना जीत में किंचित नहींं भयभीत मैं' जबकि असल में ये 'शिवमंगल सिंह सुमन' ने लिखी हैं और वाजपेयी जी अक्सर इन्हें सिर्फ सुनाया करते थे ।

फिर एक प्रेरणाप्रद रचना सुनी 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' जो आज भी कई वेबसाइट पर 'हरिवंश राय जी' के नाम से पढ़ी जा सकती है लेकिन यथार्थ में उसके रचनाकार हैं 'सोहनलाल द्विवेदी' ।

दीपाली अग्रवाल
दीपाली अग्रवाल
ये साहित्य के बलात्कार की कुछ ही घटनाएं हैं, बलात्कार इसलिए कि साहित्य की कभी चोरी नहीं की जा सकती क्योंकि साहित्य कोई भौतिक वस्तु नहीं है, उसे कोई प्रेम से रचता है तो कोई विरह से, कोई ग़म में लिख़ता है तो कोई अकेलेपन में, शब्दों का आलिंगन कर जब स्नेह से बोसा दिया जाता है तब श्रृंगार का प्रादुर्भाव होता है और कलम को तोड़कर उचटी स्याही से आता है वीर रस और काग़ज़ का पन्ना लेकर आस्था-भाव में झूमने से उद्भव होता है भक्ति रस का ।

ये 'रस, गुण, विचार, अलंकार, शब्द, छंद, गद्य, पद्य' की विधा चाहें जो हो लेकिन अगर साहित्य है तो एक संपुट आत्मा उसे रचने वाले की उसमें अवश्य होती है और जब इस एक संपुट को कोई अपना नाम दे दे तब वह चोरी नहीं होती वो होता है उस साहित्य का बलात्कार क्योंकि साहित्य कोई भौतिक वस्तु नहीं है बल्कि उपकल्प है मन की चेष्टाओं का ।



- दीपाली अग्रवाल

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  1. दीपाली जी, आजकल ऐसे संदर्भ.भरमार हैं मेरे एक जानकार ने अपनी कविता की पाँडुलिपि भेजी जो एक समय आधी ही थी, बाद में पूरी हुई. वह कविता नेट पर पच्चीसों के नाम है और उनमें एक नाम है गुलजार. गाँधी की आड़ में लोग क्या क्या कह जाते हैं अब सर्वविदित है... उनको मार्केटिंग मीडिया या कहें एजेंट बना दिया है.

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  3. दीपाली, मैं हमेशा से ही आपके लेखन का प्रशंसक रहा हूँ. साहित्य और उससे सम्बंधित गूढ़ विषयों पर तुम्हरे लेख पढ़ने लायक होते हैं. इस लेख में भी आपने, साहित्य और साहित्यकार पर होने वाली अनैतिक और क्रूर मानसिक बर्बरता को गंभीरता से, और अपने विचारों को अपराध के बराबर दंड के लहज़े में प्रस्तुत किया है. मुझे ऐसा भी महसूस होता है के इस लेख में बहुत से पक्ष और पहलू ऐसे भी थे जिन पर बात हो सकती थी, पर शायद उसके लिए एक विस्तारित लेख की आवश्यकता है. आशा है आप जल्द ही उन पहलुओं पर भी कुछ कहेंगी. अंततः, आपके लेख को पढ़कर अच्छा लगा, जीवन में आप जितना आगे जाओगी नए अनुभव आपके लेखन में उतनी ही सटीकता और सुन्दरता लायेंगे.

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