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अविचलित कर्म पथ पर बढ़ते जाना


हिमाचल की गोद से
बलखाती इठलाती
जब चल पड़ती है
उज्ज्वल धवल जल की
अविरल धाराएं,
कर्म पथ
तो न सोचती सामने
क्या है और दाएं बाएं क्या
बस आगे ही आगे बढती जाती है,
राह में आने वाली हर
वैसी वस्तुएं जो उसके
वेग को सह न पाते
अपने में समेटे बढती जाती,
कितना भी रोके बड़ी बड़ी बाधाएं
पर बिना विचलित
आगे बढ़ने की राह ढूंढ
बस बहती जाती है,
क्योंकि नदियों का स्वभाव
बिना डरे आगे ही आगे
बढ़ने का जो है।
पहाड़ खाई पाटकर
जब चल पड़ती सपाट
मैदानी रास्तों से होकर
नदी की कल कल धारा,
हिचकोले खाती
कभी इस किनारा
तो कभी उस किनारा
जा मिलती सागर के
अथाह जलराशि में,
पर ये न जान पाती
किसको लाभ तो
किसकी हानियां हुई,
ये जब जब अपने में
थामती अथाह जलराशि
तो बाढ़ रूप मे
विनाश लीला भी दिखाती,
बाढ़ को जब समेटती
तो इस नद जल से
विरानियां हरियाली
से लहलहाती है,
जन जन को जीवन
ऊर्जा से भरती है,
फिर बाढ़ से ऊबरे
जनमानस के मन में
खुशियां उल्लास का
प्रस्फुटन होता है।
ठीक वैसे ही
कठिनताओं में भी
पल बढ़ कर युवा हुए
कर्मठ कर्मयोगी भी
अपने लक्ष्य से बिना भटके
निरंतर कर्म करते रहते है।
एक सच्चा कर्मयोगी
सुख दुख के पाले में
हिचकोले खाकर भी
अपनी सच्ची निष्ठा से
बिना विचलित
कर्तव्यनिष्ठ होकर
निरंतर कर्म पथ पर
निस्कंटक बढ़ते जाते हैं,
क्योंकि उनका स्वभाव
सबके लिए सुखकारक होता है,
दुर्जन ईर्ष्यालु बनकर
अपने कर्मों से
बस अपनी ही हानियां करते,
सज्जन श्रद्धालु बनकर  हमेशा
उन्नति के मार्ग बढ़ते जाते है,
और अपने जीवन में
खुशियां उल्लास की
सौगातें पाते हैं।



रेणु रंजन
शिक्षिका, राप्रावि नरगी जगदीश
पत्रालय : सरैया, मुजफ्फरपुर
मो. - 9709576715

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