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डर / विज्ञान कथा

दिनकर की टाइम-मशीन 2140 में आ पहुँची थी । वहाँ वह धरती की बर्बादी के भयावह दृश्य देखकर सन्न रह गया । चारों ओर ढह चुके भवनों के अवशेष थे । ध्वस्त शहरों का मलबा था । दूर-दूर तक एक भी साबुत बची इमारत या पेड़-पौधा नज़र नहीं आ रहा रहा था । कहीं-कहीं ज़मीन जल कर काली पड़ गई थी । जगह-जगह चिपके हुए धातु के गले हुए टुकड़े अतीत में घट चुके किसी महा-विनाश का संकेत दे रहे थे । बाक़ी जगहें बर्फ़ से ढँकी हुई थीं ।
                दिनकर ने टाइम-मशीन में लगे सुपर-कम्प्यूटर से इसकी वजह पूछी । सुपर-कम्प्यूटर ने बताया कि
टाइम-मशीन
टाइम-मशीन
कई दशक पहले 2080 में तृतीय विश्व-युद्ध हुआ था जिसमें सारी मानवता नष्ट हो गई थी । पश्चिमी दुनिया के अमेरिका और यूरोपीय देश एक ओर थे जबकि चीन और उत्तर कोरिया का गठबंधन दूसरी ओर था । दोनों ओर से घातक परमाणु-अस्त्रों और प्रक्षेपास्त्रों का प्रयोग किया गया था , जिसकी वजह से धरती पर मौजूद पशु-पक्षी , पेड़-पौधे , मनुष्य और इमारतें आदि सब नष्ट हो गई थीं । इस त्रासद युद्ध के बाद धरती पर लगभग तीस वर्षों तक ' न्यूक्लिअर विंटर ' या ' परमाणु सर्दी ' छाई रही । इसने धरती पर से बचे हुए जीव-जंतुओं का नामो-निशान भी मिटा दिया -- सुपर-कम्प्यूटर के स्क्रीन पर उपलब्ध यह जानकारी पा कर दिनकर स्तब्ध रह गया । वह अपने टाइम-मशीन की मदद से तृतीय विश्व-युद्ध के बाद के छठे दशक की बंजर , बियाबान और उजड़ी धरती पर पहुँच गया
था ।
                 पहले तो दिनकर अपना सिर पकड़ कर बैठ गया । वह 2040 के अपने काल से अपने टाइम-मशीन में बैठ कर भविष्य की सैर के लिए निकला था । उसने सोचा था कि वह भविष्य में सौ साल आगे जा कर मनुष्यता की प्रगति को देखेगा । कितनी उम्मीद ले कर वह 2140 के काल में पहुँचा था । किंतु अब इस नष्ट दुनिया को देखकर उसका मन किया कि वह विलाप करे ।
                 किसी तरह दिनकर ने खुद को सँभाला । फिर उसके दिमाग़ में कुछ विचार आने लगे । उस के पास अभी भी उसकी प्रिय टाइम-मशीन मौजूद थी । क्यों न मैं तृतीय विश्व-युद्ध से एक साल पहले , यानी 2079 में जा कर इस युद्ध को रोकने का प्रयास करूँ -- उसने सोचा । इसमें ख़तरा तो बहुत होगा , पर यदि मैं किसी तरह इस कार्य में सफल हो गया , तो शायद मेरी धरती भविष्य में बची रह जाएगी । उसने तत्काल टाइम-मशीन के बटनों को 2079 की तिथि में लगा दिया । उसके हरा बटन दबाने पर वह और उसकी टाइम-मशीन पलक झपकते ही 2079 में प्रक्षेपित हो गई ...

                वह शाम का समय था जब परछाइयाँ लम्बी हो रही थीं । दिनकर की टाइम-मशीन वापस उसके घर के बड़े-से आँगन में उसके अपने समय 2040 में प्रकट हो गई । वह बेहद थका और घबराया हुआ लग रहा था । घर के भीतर से बाहर आँगन में आते हुए उसकी पत्नी ने कहा , " अरे , आप वापस आ गए ! शुक्र है भगवान का । मुझे तो फ़िक्र हो रही थी । देखिए , यह टाइम-मशीन एक दिन आपको हम सब से दूर कर देगी । । मैं कह देती हूँ -- मुझे ग़ुस्सा आ गया तो एक दिन मैं आपकी इस मुई टाइम-मशीन को आग लगा दूँगी । आइ विल डेस्ट्रॉय इट वन डे , हाँ ! "
                  " अरे जान , क्यों कोस रही हो इस टाइम-मशीन को । इसी की वजह से आज मैं भविष्य की अपनी दुनिया बचा कर लौटा हूँ । " दिनकर ने सफ़ाई दी ।
                  " ऐसा क्या गुल खिला दिया आपने , ज़रा मैं भी तो सुनूँ ! " पत्नी बड़े धाँसू अंदाज़ में बोली ।
                  " कुछ ख़ास नहीं जान । जब मैं 2140 में पहुँचा तो मुझे पता चला कि 2080 में हुए तृतीय विश्व-युद्ध में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की वजह से हमारी धरती पर से सारा जीवन नष्ट हो गया था । इसलिए मुझे 2079 में जा कर 2080 में होने वाले विनाशकारी युद्ध को रोकना पड़ा । " दिनकर बोला ।
                  " आपने युद्ध को कैसे रोका ? " पत्नी ने उत्सुकता से पूछा ।
                  " देखो , यह बात अपने तक ही रखना । मैंने 2079 में जा कर 2080 में होने वाले युद्ध को रोकने के लिए एक गुप्त योजना बनाई । उस योजना के तहत मैंने उस समय मौजूद अमेरिका के शासक और चीन और उत्तर कोरिया के तानाशाहों को मरवा दिया । यह मत पूछना कि यह सब मैंने कैसे किया । यह एक लम्बी कहानी है जो फिर कभी सुनाऊँगा ।तीनों शासकों की हत्या होते ही उन देशों में नए शासक आ गए और तृतीय विश्व-युद्ध टल गया । "
                  " पर आप इतने घबराए हुए क्यों लग रहे हैं ? आपने तो धरती को बचाने के लिए भलाई का काम किया । और अब आप वापस अपने समय 2040 में हम सब के पास सुरक्षित लौट आए हैं । " पत्नी ने पूछा ।
                 अपने माथे पर से पसीना पोंछते हुए दिनकर बोला -- " जान , 2079 के शासकों के पास भी तो टाइम-मशीन होगी । मैं भविष्य के समय का एक फ़रार मुजरिम हूँ । यदि उस समय की सुरक्षा-एजेंसियाँ टाइम-मशीन की मदद से मुझे ढूँढ़ते हुए मेरे युग 2040 में मेरे पास आ पहुँचीं तो ? बस यही डर मुझे सताए जा रहा है । "

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प्रेषक : सुशांत सुप्रिय
            A-5001 ,
            गौड़ ग्रीन सिटी ,
             वैभव खंड ,
             इंदिरापुरम ,
             ग़ाज़ियाबाद - 201014
              ( उ. प्र . )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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