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संगमरमर और रेशमी कपास

लेखक: विष्णु भाटिया
अनुवाद:देवी नागरानी 
संगमरमर होता है-सख्त और कठोर। उँगलियाँ उलझेंगी, तो छिल जाएँगी, लहुलुहान हो जाएँगी, बेकार में ही दर्द मोल लेंगी। जख्म रह जाएँगे, सूखकर भी नहीं सूखेंगे। मैंने यह दर्द नहीं चाहा, फिर भी संगमरमर से उँगलियाँ उलझा लीं। मेरा भरम भी टूटा। कुछ टूटकर जैसे मेरे भीतर जुड़ गया। संगमरमर न था जैसे रुई थी। बिलकुल रेशम की रुई। हाथों से फिसल-फिसल जाती थी। उँगलियाँ भी बिलकुल नहीं ठहरतीं। बर्फ पर स्केटिंग करते हुए जैसे फिसलती हों। रुई हाथों में ही नहीं आती। मैं चुन-चुनकर थक गया, रेशम की रुई बिना उखड़े, बिना उलझन की गाठों के ज्यों-की-त्यों बरकरार रही।
विष्णु भाटिया
विष्णु भाटिया
गुलाब की डाली टाँगों में चुभकर दर्द देती, काँटे चुभ-चुभकर निशान छोड़ जाते। उन स्थाई निशानों को देखकर, सारी उम्र उनकी दवा के लिए भटकता रहता था। हर शहर, हर गाँव, हर देश।
वह चुभन भी नहीं मिली। दर्द का वह कड़वा ज़हर भी न मिला, जो मेरे अंग-अंग में फैल जाए। शायद मेरे शरीर में चढ़ा हुआ ज़हर वहाँ उतरा हो।
कील में टँगा हुआ सूट, अधजली सिगरेट के टुकड़े...बिलकुल टूटे हुए किसी झुनझुनाते खिलौने की तरह।
उलझन ने बाँह की चूड़ियाँ तोड़ दीं। पहले वे खनखना रहीं थी... मंद व मधुर संगीत का सृजन कर रही थीं, सरोद की तरह।
मैंने वैसा संगीत नहीं चाहा था। ज़िदगी में कोई भी संगीत नहीं। फिर भी वह सरोद किसलिए। कुछ पलों के लिए ख़ुद को धोखा देने, ख़ुद को ठगने के लिए! बस, हम ख़ुद को ठगते रहते हैं।
वही पूर्ण नग्नता मैंने चाही थी। मेरे मन के औरंगजेब ने साज़ तोड़
दिया। नहीं, अब सरोद का मंद व मधुर संगीत झरने की तरह बह निकलेगा। मन की शांति भंग न करेगा।
मैं अब भी बिलकुल नंगा हूँ। शरीर के कपड़े भी मेरे नंगेपन को नहीं छिपा सकते। दूसरे अंधे हैं, अपने-आपको नहीं देख सकते या देख़ते हैं, तो आँखें बंद कर लेते हैं। मैंने अपने-आपको देखा है और यही जाना है कि मैं बिलकुल नंगा हूँ, नंगा। हर इंसान नंगा है और सदियों से नग्नता को छिपाने के लिए आवरण चढ़ाता आया है। बहाना धूप, ठंड, बरसात का है, बिलकुल बकवास। उनका मन नंगा है। वे उस नग्नता को देखना नहीं चाहते, कपड़ों का सहारा लेते हैं। नग्न सभ्यता की लाश को कितने दिनों तक ढक पाएँगे? कितने दिन तक परदा करेंगे?
चूड़ियों की तरह उसे भी टूटना चाहिए। कोई ज़रूरत नहीं उसकी। एक भरे बाजार और भीड़ से गुजर रहा हूँ, बिलकुल नंगा। कुछ अनादर, कुछ पत्थर मेरा भाग्य हैं। नहीं, मैं ऐसा भाग्य नहीं चाहता। इसीलिए मेरे तन पर कपड़े हैं। हंसी-मजाक के पत्थरों की चोटें मैं अपने शरीर पर झेलना नहीं चाहता। हक़ीक़त में मैं कुछ भी सहना नहीं चाहता। कुछ भी सह पाना मेरी सहन-शक्ति के बाहर है। कुछ भी भोगना मेरे उपभोग की क्षमता के बाहर है।
मैं सहता भी हूँ, हर पल एक तीर है, उसके बाद चुभन है, चोट है।
पर मेरे लिए कोई, कोई भी समय, समय नहीं। कोई पल, पल नहीं, कोई क्षण, क्षण नहीं। वक़्त के बहाव का ज्ञान मैं नहीं चाहता। मैं वक़्त में जीते हुए भी वक़्त के बाहर जीना चाहता हूँ।
दरअसल, वक़्त और दुनिया मुझसे भोगी नहीं जाती, सही नहीं जाती। ट्रेन के दूर-दूर तक साथ जाते, समान फासले पर टिकी पटरियाँ। पटरियों के बीच में समझौता है। इसलिए वे टूटी नहीं हैं। दूर-दूर तक साथ चलती आई हैं। ज़िदगी में भी पटरियों जैसा समझौता लागू करके उसे जिया जा सकता है, पर अगर कोई समझौता न चाहे? वह...? अंधी ट्रेन की सीटी उसकी जबान बनी। उस जबान ने जैसे कुछ कहा हो, जो उस तक क्षण में मैंने सुना और गर्दन पटरी से ऊपर उठाई। न रहती वह गर्दन, न यह शरीर, यह नग्नता का अहसास। ज़िदगी ने शायद मुझे बाहों में भरना चाहा था। नहीं, उन बाहों में नहीं जा सकता। मौत की गोद भी स्वागत के लिए तैयार नहीं। दूरी पर पड़े सैंडिल का जोड़ा, पहले मैंने वहीं एक जोड़ा सैंडिल का देखा, फिर ज़मीन खोदते अँगूठे को, जिसमें चाँदी की अँगूठी पहनी हुई थी।
विशाल रास्ते के उस छोटे हिस्से की छोटी जगह में एक गढ़ा स्थित था। अँगूठे से उसने मेरे दिल की रेती खोदकर गढ़ा बनाया था। शायद उस गढ़े को भरने के लिए मैं भटका हूँ। नहीं, कोई भी गढ़ा नहीं है मेरे भीतर। कुछ भी नहीं टूटा है। रेत में वह अँगूठा पसरे हुए दूध के समान लग रहा था। नहीं, अँगूठा नहीं था। पसरा हुआ दूध था, जो रेती में जज्ब होकर एक हो गया था। मैंने चाहा था वह दूध जैसा अँगूठा चूस लूँ, पर होठों पर रेत लग जाएगी। सोचकर, ‘न’ कहा।
किसी इत्र की ख़ुशबू! नहीं, मैं नहीं सह पाऊँगा। ख़ुशबू का ताब मैं नहीं सह पाया। मैं ख़ुशबू को भोग नहीं पाया। इत्र से भरा हुआ लिफ़ाफ़ा न था, ख़ुशबू थी। कुछ ख़त! उन ख़तों में मजमून! नहीं, मैं उन ख़तों के मजमून समझना नहीं चाहता। याद करना नहीं चाहता।
मेरी आँखों में आग है, शरीर में आग है, आत्मा में आग है। एक ही वक़्त पर तीन-तीन आतिशें। तीनों के चंगुल में हूँ। कोई एक भी आग बुझती नहीं। ख़ुशबू जल गई, ख़त का मजमून जल गया...सब-कुछ जल गया। निगाहें भी, चेहरा भी...।
हक़ीक़त में मेरा कोई भी नाम नहीं है। कोई भी चेहरा नहीं है। इस समूची भीड़ ने मुझसे मेरी हस्ती छीन ली है। मैं अपना चेहरा याद करना चाहता हूँ, तो मुझे आईने की ज़रूरत महसूस होती है। मैं अपना नाम याद करना चाहता हूँ, तो मुझे औरों की जुबानों की ज़रूरत महसूस होती है। मेरा कोई चेहरा था, कोई नाम था, याद नहीं आ रहा। मैं शरीर हूँ, आत्मा हूँ, कौन हूँ? क्या हूँ? कुछ भी नहीं हूँ-लेकिन कुछ ज़रूर हूँ, क्योंकि हर क्षण मुझे अपने कुछ होने का अहसास तोड़ रहा है। मुझमें कुछ है। कुछ हूँ, जिसकी वजह से ये लगता है, कुछ है। यह क्या मेरा नंगा शरीर? मेरा नंगा मन?
मैं क्या हूँ? क्या होना चाहता था? फ़कत एक चेहरा? एक नाम? इसके
सिवा क्या हस्ती है इंसान की? चेहरे में जीना, नाम में जीना। मौत तो मैं मौत के बाद भी नहीं चाहता। ज़िंदगी क्या है? वही, जो मौत के बाद भी वह जीना चाहता है? मरकर भी नहीं मरता। क्या यही ज़िंदगी है?
बिजली के खंभे की तारे रस्सियाँ बनकर शरीर के साथ उलझ गई हैं। मैं शॉक ग्रस्त कबूतर या कौआ बन गया हूँ। शॉक, जो शरीर को शुष्क कर देता है। मेरे हाथों को शुष्क करेगा, मेरे चेहरे को शुष्क करेगा, नाम को भी।
खंभे पर बैठा कबूतर, साधू की तरह समाधी में है। वह गहरी सोच के सागर में चला गया है। मौत का डर उसे है या नहीं, कहा नहीं जा सकता। मौत क्या है? ज़िन्दगी का अंत। ज़िंदगी क्या है? मौत की मंज़िल की ओर यात्रा। इतनी तवील ज़िंदगी की यात्रा की मंज़िल मौत? मौत के पास अँधेरा है, तो ज़िंदगी  के पास भी रोशनी नहीं। 
रोशनी कोई भी नहीं चाहता। हम सभी चमगादड़ की तरह रोशनी से डरते, अँधेरे में सुख हासिल करने की ख़ातिर भटक रहे हैं। कौन सा सुख? किसके लिए? शरीर के लिए? आत्मा के लिए? किसका शरीर? किसकी आत्मा?
कौन सा दुख? कौन सा सुख? कौन सा और कहाँ है उनका विच्छेद? सीमा रेखा? दुख भी अँधेरा, सुख भी अँधेरा। शरीर अँधेरा, आत्मा भी अँधेरा।
नहीं, मैं दुख-सुख, शरीर-आत्मा से ऊपर नहीं उठ सकता। उनमें न चाहते हुए भी पड़ा रहा हूँ। यह रहने की मजबूरी! मैं रहना नहीं चाहता। कुछ भी होने की संभावना में होना नहीं चाहता। क्या शून्य?
शून्य शायद एक ख़ला है। यह रिक्तता हमेशा ‘भराव’ चाहती है। शून्य के भर जाने की संतुष्टि मिलेगी। शून्य, शून्य न रहेगा।
लेकिन ये साँसों की गर्मी, दिल की तेज़ धड़कन...।
एक अहसास, शायद समझौता, शरीरों का? आत्माओं का?...
एक जान, कुछ साँसों का बोझ। यही है ज़िंदगी? उसकी हस्ती...।
मौत क्या है? ज़िन्दगी से छुटकारा?...मुक्ति क्या उसका हल है? जीवन की समस्या क्या उससे हल हो पाएगी? जीवन, जीवन न रहेगा? मृत्यु, मृत्यु न
रहेगी। कोई भी वजूद न रहेगा।
देवी नागरानी
देवी नागरानी
पर आज भी मेरा क्या वजूद है? नाम के सिवाय? चेहरे के सिवाय? जब मैं नाम के लिए जबान और चेहरे के लिए आईने का मोहताज हूँ। चेहरा और नाम, भीड़ के दरिया में बह गए हैं...डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, इंसान नहीं, बल्कि पदार्थ बन गए हैं। हर क्षण अपने कौशल और क्षमताओं को बेचते नज़र आते हैं, जिन्हें ख़रीदा जा सकता है, बेचा जा सकता है। उपाधियाँ बिक रही हैं, इनाम बिक रहे हैं, दिल भी बिक रहे हैं। सबकुछ बिकाऊ है। जो कुछ भी इंसान का है, वह सब-कुछ बिकाऊ है। इंसान ख़ुद भी सौदा होता है। उसे भी बिकना और ख़रीदना होता है। व्यापार चलता रहता है।
मैं इसमें नहीं हूँ, इससे ऊपर भी नहीं हूँ, नीचे भी नहीं हूँ। कुछ भी नहीं हूँ। ‘कुछ भी नहीं’ बनकर रहना चाहता हूँ। बनना और टूटना भी नहीं हूँ। शायद क़ब्रिस्तान में जाती आत्मा मेरी जोड़ीदार है। मैं मरी हुई आत्माओं का साथी हूँ, साक्षी हूँ।
लेकिन ज़िन्दगी की गति-संचार, लाशों की गति और उनकी हरकत भी है। लाशें हैं, जो दिन में चलती हैं और रातों को अपनी अपनी क़ब्रों में बंद हो जाती हैं।अंधकारमय बंद कमरे, जिनमें रोशनी के लिए कोई भी रास्ता नहीं।
आवरण और परदा और नक़ाब और अँधेरा, रोशनी से कोई भी संबंध नहीं।
बेस्ट बस का विशाल गोल-गोल पहिया जैसे मेरे सीने पर से गुज़र गया है। उसके बाद भी मैं जिंदा हूँ। पहिया फिरता रहता है, फिरता रहता है। फ़ासला कम होता रहता है, दूरी कम होती रहती है। मौत की तरफ़ हम नज़दीक, बहुत नज़दीक होते रहते हैं। शायद यही हमारा भाग्य है। शायद इसलिए ही हम ‘होना’ और ‘रहना’ चाहते हैं।
सौ-सौ बसों के सौ-सौ पहिए, मेरे सीने पर से गुज़र गए हैं। तदपश्चात्
भी मैं मरा नहीं हूँ। मर-मरकर भी जिंदा रहा हूँ। मौत मेरी मजबूरी है और जीना कायरता। शायद इसी कायरता का नाम जिंदगी है। कायरता ही उसका चेहरा है। कायरता ही उसका नाम है.
संगमरमर मेरे उँगलियों के उलझाव में रेशमी कपास बन गया है। कोई भी कठोरता, कोई भी सख्ती नहीं।
साँसों का स्पर्श!...
टूटी हुई चूड़ियों के टुकड़े...। इलैक्ट्रिक की तारों में उलटा लटका हुआ मैं। अँधियारी क़ब्रों में, कमरों में बंद मैं...। न रोशनी, न हवा...कील में लटके कपड़े...
मुझे कुछ भी याद नहीं आता। न उसका चेहरा, न उसका नाम, न अपना नाम।
गुलाब की डालियाँ मेरी टाँगों से लिपटी हैं। मुझे चुभती नहीं। कोई भी पीड़ा नहीं। दर्द कुछ भी नहीं। न साँसों में हलचल, न कोई धड़कन। कुछ भी नहीं।
सिगरेट का धुआँ, खंडित ठहाके, खोखली हँसी...शरीर के बाद... कुछ भी नहीं है।


लेखक परिचय:
विष्णु भाटिया (१९४१- ) 
कराची सिंध (पाकिस्तान), उपन्यास - ४, कहानी सं. ११, लेख - १ एवं अनुदित-२ पुस्तकें प्रकाशित । सिंधी नई कहानी में ‘खास’ तथा साहसी कथाकार के तौर पर प्रख्यात । नौजवान पीढ़ी का बेबाक लेखक, जिन्होंने कहानियों के माध्यम से वाद-विवाद को जन्म दिया है। कहानी में शहरी ज़िंदगी की विचारधारा और समालोचना के तीखे तेवर पाये जाते हैं। कहानियों के कुछ संग्रह प्रकाशित है: जैसे चन्द्रमुखी, टूटे हुए अक्स का जोड़, सूरज का टुकड़ा वगैरह .....! अ.भा.सि.बो.सा. सभा, मुम्बई की ओर से १९९५ में सम्मान ।                                           पता : १२०/११४, मुलंद कॉलोनी, मुम्बई - ४०० ०८२ 

अनुवादिका 
देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, (एक अंग्रेज़ी) 2 भजन-संग्रह, 8 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, महाराष्ट्र अकादमी, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुसकृत। 
संपर्क 9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050॰ dnangrani@gmail.com  

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