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किन्नर 


किन्नर
किन्नर
किन्नर हूँ समाजों के विद्वेषों को ले जीता हूँ
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।

ब्रह्मा की प्रतिछाया हूँ, कश्यप-अरिष्ट की उत्पत्ति हूँ।
बुध, शनि, शुक्र, केतु का अशुभ योग, समझी एक विपत्ति हूँ।
अश्वमुखों का पुत्र फिर भी, दोहरे जीवन को जीता हूँ।
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।

मैं भी पीड़ा का संवाहक, सम्मोहन का स्वामी हूँ।
एक दिवस का मेल-अरावन, विधवा-सा जीवन जीता हूँ।
झूठी स्मित के बल पर हँसकर, गरल घूँट मैं पीता हूँ।
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।

पारंगत हूँ नृत्य विधा का, गायन में भी गीता हूँ।
वृहन्नला का मैं हूँ वंशज, अर्जुन से भी जीता हूँ।
मेरी पारस-जिव्हा-वाणी से, पर-जीवन-कंचन कर देता हूँ।
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।

मेरा समाज, मेरी रीतियाँ, मैं भी अपनों का हिस्सा हूँ।
परित्यक्त्य मैं, भीषण आहत, अपनों ही से गुस्सा हूँ।
अपने मंगल-मुखी-चितवन से, मंगल तुम्हारा करता हूँ।
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।

मृत्यु मुझे भी आती है, मैं भी अपना शव बनता हूँ।
पर, मेरे मरण-मंगल पर मैं, वियोग-अश्रु में नहीं बहता हूँ।
निशी-निमंत्रण पर ले जाकर मैं चिरनिद्रा में सोता हूँ।
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।

जीता आया हूँ मर-मरकर, अधिकारों को भी पाऊँगा।
वर्षों-संघर्षों की आशा, उपदेव पुनः बन पाऊँगा।
किन्नर हूँ समाजों के विद्वेषों को ले जीता हूँ।
मैं ही अपना राम, मैं ही अपनी सीता हूँ।।


रचना: डॉ. शुभ्रता मिश्रा
वास्को-द-गामा, गोवा

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