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कांच


जयति जैन
जयति जैन
रुकमणि जी आज बडे गुस्से में थीं, अभय बाबूजी की तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी पास जाने की ! ये गुस्सा भी तो उन्हीं का दिलाया था, बात बात पर अपनी रुक्कू को चिडाना उन्हें जो भाता था फ़िर क्या चिड गयी उनकी रुक्कू और पडोसियों तक को घर पर बर्तन फेकने की खबर मिल गयी, गुस्से में रुकमणि जी हमेशा घर के बर्तन का ही सहारा लेती थीं, वही फेंकती थी ! अभय बाबूजी के घर के ज्यादातर बर्तन टेडे-मेडे थे !
"रुक्कू देखो वो गिलास नहीं फेका अभी तक तुमने, बेचारा इंतजार कर रहा है " अभय बाबूजी का बोलना हुआ और वह गिलास ज़मीन पर, फ़िर नजर आया फ्रिज़ पर रखा फोटोफ्रेम जिसे 1 दिन पहले ही अभय बाबूजी लेकर आये थे, साथ ही 4-5 और भी लाये कि उनकी रुक्कू पसंद करले कौन सा उसे चाहिये पर किस्मत से एक ही फ्रिज़ पर रखा था फोटो से सज़ा !
रुकमणि जी ने उठाया और जमीन पर कुछ ही सेकेन्ड में एक कांच छोटे छोटे टुकडो में तब्दील ! 
अपनी शादी की फोटो ज़मीन पर देख वह खुश तो नहीं हुई लेकिन गुस्सा जरुर कम हो गया !
दूसरा वह उठा पाती इससे पहले ही अभय बाबूजी ने उनको दिया कि लो तोड़ दो मेरी जान, सारे तोड़ दो ! दुकान वाले को बोल देगे रास्ते में गिरकर टूट गये !
रुकमणि जी की आंखों में आन्सू थे, जो कांच के टूट जाने से नहीं बल्कि ज़मीन पर पडी उस फोटो से थे, जिसको अभय बाबूजी कांच के टुकडो के बीच से उठा रहे थे !


- जयति जैन 'नूतन', रानीपुर झांसी उ.प्र.

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  1. अच्छा प्लॉट है... आप और अच्छा लिख सकती थीं.. कोशिश जारी रखिए.

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  2. नूतन जी आपकी लघुकथा बढ़िया है.

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