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वैदिक दर्शन

दर्शन आनंद (philosophy) का विषय है विशेषतः जब मन] सत्य और केवल सत्य] को खोजना चाहता है और उस शानदार पथ पर अग्रसर होना चाहता है जो मनुष्य को वासना तथा विभव व वैभव के अहंकार की दलदल से मुक्त करा सके। दर्शन बुद्धि से प्रेमालाप करने की कला है।
हम अपने मन को सदा उत्साहित और लगातार उन्नत करते रहते हैं और यह अपना मन है जो हमारे चरित्र का निर्माण तथा अंततः हमारी नियति का निर्धारण करता है। मन वास्तव में क्या है\ यह वह बिन्दु है जहाँ मस्तिष्क द्वारा धारण की हुई निपुणता व ज्ञान की किरणें और हृदय (अंतःकरण) में जन्मी अनुभव व बुद्धि की किरणें एक बिन्दु पर मिलती हैं। मस्तिष्क और हृदय दोनों सारी जिन्दगी ज्ञानेन्द्रियों की तरह काम करते हैं और दोनों हमारे विचारों को आकार देते हैं। अतः मन हमारे विचारों का उद्गम स्थान बन जाता है जहाँ सांसारिक व आध्यात्मिक धारणायें जो हम निर्मित करते हैं] मिलकर एक हो जाती हैं।
बुद्धिमान व्यक्ति खोटे मूल्य तथा विचारधारा की गलत प्रवृत्तियों का उन्मूलन करने की कोशिश करता रहा
वैदिक दर्शन
वैदिक दर्शन
है। अंतः में एक स्वस्थ मन के लिये पनपाना होता है प्रेरक विचारों जैसे पवित्रता] प्रेम] श्रद्धा] आस्था व करुणा को] स्वतः में आत्मविश्वास को] अंतः की निश्चलता को] मन की स्थिरता को और निःस्वार्थ कार्यकलापों को अपनाने की चाह को। प्रेरणादायी विचारों की जाग्रति जिनका हम सम्मान करते है हमारी मानसिक संपदा तथा पवित्रता] स्थिरता] प्रेम] प्रसन्नता व आकांक्षा जैसे ज्ञान के खजाने में वृद्धि करती है।
प्रारंभ से मनुष्य विप्लव से जूझता रहा है याने जब से उसे ^शून्य* से जीवनरूपी उपहार मिला मिला ---  जिसे उसने बिना प्रयास --- बिना संघर्ष के पाया। यह चमत्कारी उपहार था क्योंकि तब दर्शनज्ञान उसके प्रखर मन में अंकुरित नहीं हुआ था। फलतः जीवन अर्थहीन] स्वतः को नकारनेवाली हिचक और निसारता से युक्त था। कंदराओं की जिन्दगी दे पायी केवल अंधकारमय आश्रय और भ्रमण के लिये घने अंधेरे जंगल जो बाहरी प्राकृतिक प्रकाश पर निर्भर थे और इस तरह मनुष्य अंतः के प्रकाश से अज्ञानी रहा।
परन्तु बिना अत्याधिक विलंब के (लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व) हमें अर्थपूर्ण विचारों की प्रतिध्वनि सुनने मिली जिससे मनुष्य सोचने लगा और सत्य के प्रकाशवान क्षेत्र में प्रवेश कर गया। 
“O Lord, thou lead us
From untruth unto truth
From Darkness unto light
From death unto immortality.”
                                     ^ असता मा सद्गमय
तमसो मा ज्योर्तिगमय
मृत्योर्मामृतं गमय।।*

      ^हे प्रभो] हमें असत् से सत की ओर] अंधकार से प्रकाश की ओर एवं मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।*
                         --- Brhadaranyaka Upanishad 1.3.38    
ये दार्शनिक शब्द मात्र कोमल ऊगते नन्हें पौधे के द्योतक नहीं थे बल्कि वे वो मधुर फल थे जो वैदिक विचारों के खिलते फूल के परिणाम थे। हालाकि इसके लिये खुद को समझने की आवश्यकता थी। मनुष्य क्या है और क्या बन सकता है\ स्पष्ट सोच व अचूक विश्लेशण हमें दो शब्द यथा आत्मा और परमात्मा की ओर ले गया और इन दो शब्दों ने मन को गहन चिंतन-मनन की अवस्था में पहुँचा दिया।
मनन की कला ने जीवन व मृत्यु के अथाह रहस्य को] सत् व असत्] पाप व पुण्य आदि सभी विश्व में विद्यमान द्वैत्व के संदर्भ में खोजने में मदद की। 
आत्मा व परमात्मा सारहीन शब्द नहीं हैं। ये शब्द उन सब प्रश्नों का उत्तर देते हैं जो सुकरात ने बाद में अपने साथियों से किये थे। to’ ti यह क्या है\ तुम्हारे स्वतः के क्या मायने है\ सद्गुणों का क्या अर्थ है\ मन की सर्वोत्तम स्थिति क्या है\ ऐसे असंख्य प्रश्न ज्ञानी लोगों के मन में आये हैं। वेद विचारों के क्षेत्र  में गहराई से गये हैं और खोद निकाले हैं उत्तर --- उत्तर जो दार्शनिकों की प्यास को तृप्त कर सके हैं तथा उन्हें ज्ञान की गहराई में और अधिक उतरने की प्रेरणा दे सके हैं। वेदों में दुर्विचारों को अच्छे व शांत विचारों से पृथक करने की कोशिश की है  और नैतिकता की विचारधारा को प्रकट किया है। नैतिकता का उपयोग किसी शक्तिशाली को नीचा दिखाने के लिये प्रयुक्त हथियार नहीं है। गीता में हम पाते हैं कि नैतिकता शक्तिवान को शक्ति प्रदान करनेवाली होती है।
वेदों में हमें ईश्वरीय शब्द मिलते हैं] 
वसुधैव कुटुम्बकम्
पृथ्वी एक परिवार है। 
परिवार में विचारों की] अभिव्यक्ति की और अभिमत की स्वतंत्रता विद्यमान होती है। प्रत्येक के विचार में जीवन के प्रति विलक्षण मूल्यों का समावेश होता है।
प्रत्येक मानव मस्तिष्क में ज्ञान का विशिष्ट स्थान होता है और ज्ञान आत्मा द्वारा संचालित होता है। हर मनुष्य में यह शक्ति व गुण है तथा उसके पास इतना समृद्ध व प्रभावशाली मस्तिष्क है कि वह मानवीय जीवन को संवेदना व साहस के मंदिर --- मनन व समझ के रमणीय प्रेक्षागृह --- सत्य व बुद्धि के तीर्थस्थल में बदल सकता है। मानव मन में ऊष्मा से अधिक प्रकाश है। फिर भी कई पवित्र मन को विश्व द्वारा बिना उपयोग में लाये अलग-थलग रहना पड़ा है और बहुतों को फाँसी देने के लिये सलाखों में कैद होना पड़ा है। इस संसार में फैले छल-कपट से आजादी पाने के लिये अथर्ववेद में कहा गया है।
हे मानव आत्मा! अपनी शक्ति बढ़ाओ। अनंत शक्ति की धारा पथरीले मार्ग पर बहती है। दुराशय की ताकत के चिन्हों को पीछे छोड़ दो और मजबूत कदमों से आगे बढ़ो तथा अनंत यश के पार बढ़ चलो।
            Gather your strength,
O human soul!
A stream of eternal life flows on a stony bed;
Leave behind the traits of malignant forces and move forward with firm steps, and cross over to the realm of eternal glory.
           Atharva Veda 12.2.26.
            
याद रहे कि वो व्यक्ति ज्ञानी व साहसी है जो अंतः के शत्रुओं को हरा चुका है और संसार में सर्वत्र बिखरे  ईष्र्या]  द्वेष] घृणा आदि से युक्त शत्रुओं का मुकाबला कर सका है।
प्रत्येक विचार जो मष्तिष्क अपने में पैदा करता है] वह उस कव्य का अंश है जो प्रकृति के रूप व कला के सजीव चित्रण लिये हुए होता है और उसे परमात्मा की महक से भरता है। अतः ऐसे विचारों को त्यागने के पहले उनके सूक्ष्म विश्लेषण करने की आवश्यकता है। दर्शन का इतिहास बताता है कि सुकरात पर निर्णय लेने व विषपान करने का दबाव बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अरस्तू पर भी अभियोग की जरुरत नहीं थी] जिससे उस पर एथेन्स छोड़ने का दबाव पड़ता। उसे यह न कहना पड़ता कि ^वह एथेन्स को दर्शन के विरुद्ध पाप करने का दूसरा मौका नहीं देगा।*
भारत में दार्शनिक विचारों को सम्मान मिला है और मानव के इतिहास में वेदों ने सर्वप्रथम प्रतिपादित किया कि मनुष्य के पास ^सोचनेवाली आत्मा है* जहाँ विचारों का खास अर्थ है तथा इतनी शक्ति है कि वह मनुष्य को ईश्वर का प्रतिनिधित्व दे सकती है व ऐसी तर्कपूर्ण सभ्यता स्थापित कर सकती है जिसमें सत्य का समावेश सविवेक हो। वेद उस गलानेवाली प्रयोगशाला की घरिया की तरह है जिसमें विचार जो प्रारंभिक अवस्था में काल्पनिक प्रतीत होते हैं] वे तर्क के प्रभाव में तब तक रखे जाते हैं जब तक वे पवित्र न हो जावें।



शब्द जो खासकर पवित्र ग्रंथों के हैं] लोगों को कर्म के लिये प्रेरित करते हैं। अच्छे काम सत्कर्म कहलाते हैं] परन्तु जो ध्यान नहीं देते और अच्छे शब्दों से अनभिज्ञ होते हैं] वे दुष्कर्म करने प्ररित होते हैं।
महाभारत कहता है कि ग्रंथ उनके लिये क्या कर सकता है जिनके पास स्वयं का ज्ञान नहीं है। दर्पण उसके लिये निरर्थक है जिसके पास देखने का सुरूर नहीं है।
वेदों में हम पाते हैं कि हरेक शब्द में अभिव्यक्ति है। पुरातन काल में उन्हें गाये जाने की प्रथा थी ताकि एक भी दिन एक भी सत्कर्म किये बिना न बीत पावे। ज्ञान के शब्द पापी हृदय को भी जीत सकते हैं और मनुष्य को विवेकपूर्ण काम करने प्रभावित कर सकते हैं। ऋग्वेद कहता हैः
ईश्वरीय शब्दों की महाधारायें बहती हैं
संतों के मन-मस्तिष्क से
आँधी की गति लिये
तीव्र जलधारा की तरह जो ढलान में
बुद्धि की जलतरंगों-सी उमड़ती हैं
वे समस्त विघ्नों का नाश करती हैं
युद्ध के बहादुर अश्वों की तरह।

         Great streams of divine 
words flow out
From the minds of sages
With the speed of a gale
  Like rapids rushing down a slope,
Surging with the high
waves of wisdom.
They beat through all obstacles
As do a courageous war-horse.
                                                                               ------  Rig Veda 4.58.7        

ऋग्वेद में प्रार्थना की गई हैः
हमें वैसा ज्ञान दो
जो डकैतों द्वारा लूटा न जा सके
ज्ञानियों केा ऐश्वर्य दो
ज्ञानियों के लिये प्रकाश हो।

Let us be granted that
knowledge
which cannot be robbed
by dacoits;
Let the wise be given wealth;
Let there be light for
the wise.

हिन्दु दर्शन में प्रकृति के नियमों व परमात्मा के नियमों का मिश्रण है ताकि मानव जीवन के नियम उसके आनंददायक अस्तित्व के लिये बनें। वेदों ने बहुत सफलता पायी है प्रकृति व जीवन के मूल्यों के विस्तृत सागर की थाह लेने में --- वह सागर जिसमें हम मात्र नश्वर लहर हैं --- वह लहर जो समय को नियत करने काफी है। वेद उदित होते सूर्य की तरह हैं --- भारतीयों के जीवन में ताजी सुबह की तरह। वे हिन्दु दर्शन व उसकी महक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो तब से शंकारहित व पवित्र बनी हुई है।
वेद के प्रत्येक शब्द में हम एकदम सुन्दरता की ललक] सत्य की पुकार का अनुभव करते हैं जो शांत तर्क की पूर्णता लिये हुए हैं। सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का समावेश एक में है। भारतीय दर्शन का परिचय मानव मन-मस्तिष्क से कराते समय वे हमें अस्तित्व के तथ्य को भी समझाते हैं --- उस अस्तित्व को जहाँ शरीर में बसी निर्दोष पवित्र आत्मा हमें परमात्मा की पूर्णता में आत्मसात् होने के लिये अग्रसर होती है। हम सहज साँस लेते हैं और संतुष्टि के साथ वेद की बातों को ग्रहण करते हैं क्योंकि वे हमें आध्यात्म के आस्था-योग्य-ज्ञान को देते हुए हमारी समझ के पथ को प्रकाशवान बनाते हैं।
वैदिक विचारों का अध्ययन दर्शाता है कि हम संसार को स्वतः की द्दष्टि से देखते हैं और यह द्दष्टि (धारणा) यूँ ही न होकर आदर्श बन सकती है। विचारवान मन जो कि हमारी धारणा को रूप देता है] सत्य की खोज में आगे बढ़ सकता है और चूंकि सत्य  अथाह है] यह यात्रा अनंत को खोजने जैसी बन जाती है। ऋग्वेद में प्रार्थना की गई है
आ नो भद्राः ऋतवो यंतु विश्वतः ।
            --- ऋग्वेद] 1-89-1

पवित्र विचार चहूँओर से हम तक आवें।

         Let noble thoughts come to us from all directions.

दूसरों के विचारों को अनसुना कर विस्मृत करना हमारे विचारों की संकीर्णता को दर्शाता है। यह प्रार्थना हमें अवगत कराती है इस तथ्य से भी कि प्रकाश किसी भी स्त्रोत से आवे उसमें अंधकार को मिटाने की शक्ति होती है। प्रकाश दूषित नहीं होता क्योंकि यह एक ऊर्जा है जो ब्रह्मांड़ के हर छोर में सर्वव्यापी ईश्वर के अस्तित्व से अवगत कराती है। 
इस प्रकाश से लाभ पाने के लिये हमारे मन-मस्तिष्क में मात्र मुक्त स्थान की जरुरत है ताकि आंतरिक ओज का अनुभव हो सके। अथर्ववेद के स्तोत्र 6-121-4 में कहा गया है-
स्वयं को जाग्रत करो
मुक्त स्थान बनावो
बंधक को उसके बंधन से मुक्त करो
नवजात शिशु की तरह
जो स्वतंत्र है चलने प्रत्येक पथ पर।

Open yourself, creat
free space;
release the bound one
from his bonds!
Like a newborn child, freed
from the womb,
be free to move on every path!
                                                                       ----Atharve Veda 6.121.4 
परमात्मा ने सभी को अभिव्यक्ति की] सोचने की] विश्वास व श्रद्धा करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। हिन्दु दर्शन ने इस स्वतंत्रता का पूर्ण आनंद लिया है। हरेक विचार एक दीप की तरह होना चाहिये --- प्रकाश जो पथ को उजागर करता हुआ हो और प्रत्येक कदम जो हम बढ़ाते हैं वह प्रकाश से सुसज्जित पवित्र पथ पर ले जानेवाला हो --- जहाँ आत्मा का प्रकाश हो] सदा हमारे अंधकार को मिटाता हुआ। यह सूर्य के प्रकाश की तरह ब्रह्म को प्रदर्शित करता हुआ चमकता है। ये दार्शनिक विचार हमारे विवेककुशल मन का पोषण करते हैं और हमें तर्कसंगत सोचने में मदद करते हैं] विषेशकर जब इन विचारों का अर्क सटीक व पवित्र होता है। छन्दोग्य उपनिषद में लिखा हैः-
 जब भोज पवित्र हो] मन भी
  पवित्र और उज्जवल हो]
    तब स्मृति स्पष्ट और कारण व प्रभाव से विश्वस्त
  होती है]
    तब सारी व्याकुलता व जटिलता सुलझ जाती है]
      तब आत्मा को कष्ट से मुक्ति मिलती है
  तब अंधकार के पार  
   प्रकाश का साम्राज्य मिलता है।

        When food is pure,
         Mind too is pure and bright;
Thence memory clear and
sure, of cause-effect;
Thence solving of all knots
and complexes;
Thence freedom from all
misery of soul,
And crossing from dark to
                                                      realm of light.
                                                                  ---- Chandogya Upanishad        
यह मन है जो जीवन को अर्थ प्रदान करता है। मन की मदद से हम जिन्दगी सँवारते हैं। यह नीचा भी दिखा सकता है] यदि उसको पवित्रता की कमीवाले विचारों से पोषित किया जावे। मन स्थिर व सुलझी आत्मा का मित्र है और उसका शत्रु भी। जो मन पर विजय पा लेता है तो मन उनका सर्वोत्तम मित्र बन जाता है --- एक मान्य गुरु या ईश्वरीय अवतार बन जाता है। परन्तु जो मन को जीतने में असफल होता है] उसका मन सबसे बड़ा शत्रु साबित होता है।
इसे पवित्र विचारों व कर्मों की आवश्यकता क्यों पड़ती है\ वेदों ने मन की जड़ तक जाकर खोज की और पता लगाया हैः-
जीवन सत्य का चिरस्थायी स्त्रोत है
मनुष्य की आत्मा एक  अशांत हंस की तरह
सत्य की खोज में
अनंत की यात्रा पर है।
हजारों वर्ष से वह अपने पंख फैलाये
और आकाश के पार
ऊपर और ऊपर जाने के संकल्प लिये है]
व्यग्र हंस अनंत की यात्रा पर है।
उसपर ईश्वर की संपूर्ण कृपा है]
उसकी तीक्ष्ण द्दष्टि
नीचे सारे ब्रम्हांड़ को देख सकती है
फिर भी वह विश्राम करना]
शांत होना नहीं जानता
और ऊपर और ऊपर उड़ता जाता है
वह व्यग्र हंस अनंत की यात्रा पर है।

Life is a perennial search for truth.
The restless swan --- the human
soul --- is on the journy
infinite to find truth.
For thousands of years he is
flying with his wings out-
streched and the will to
reach the unscaled heights of
heaven, higher and
ever higher;
the restless swan is on the
journey infinite.
He has all the blessings of the
mighty God, his piercing eyes
percive all the universe
below, yet he knows no rest,
no peace and keeps flying
higher and ever higher.
The restless swan is on the
journey infinite.
                            ----Rig Veda 10.8.18
अपार ऊँचाई जो मनुष्य लाँधना चाहता है] आत्मसमर्पण की स्थिति है] जैसा कथोपनिषद में निम्न पंक्तियों में बताया गया हैः-
ज्ञानी मनुष्य ने अपने शब्दों को मन को समर्पित कर देना चाहिये
और यह उसने अनुभवी आत्मा को समर्पित कर देना चाहिये
और अनुभवी आत्मा ने परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिये
और इसे मनुष्य ने अपनी शान्त आत्मा को समर्पित कर देना चाहिये।

The wise man should surrender his words to his mind
And this he should surrender to the knowing self
And the knowing self he should surrender to the Great self
And that he should surrender to the Peaceful self.

श्वेतस्वतरा उपनिषद घोषित करता हैः-
वह ईश्वर एक है --- सब में समाया हुआ]
सर्वव्यापि] सभी जीवों में आत्मस्वरूप
सभी कर्मों को निहारता]
                                  सभी जीवों में निवास करता]
 देखनेवाला] गवाह वही एक है
सभी गुणों से स्वतंत्र।

He is the one God, hidden
in all beings, all-pervading,
the self within all beings,
watching over all works, dwelling in all beings,
the witness, the perceiver, 
the only one, free from qualities.
                                                             ---- Svetasvatara Upanishad 6.11

मुंड़क उपनिषद में सुन्दर वर्णन हैः.
ब्रह्म सामने दमकता है
विस्तृत] स्वयं-प्रकाशयुक्त] अकल्पनीय]
 विलक्षण से भी विलक्षण।
 वह जो दूर है उससे भी दूर]
     फिर भी यहाँ हाथ के बहुत करीब।
  वह यहाँ दिखाई देता है]
 सचेतन हृदय की गुफा में विराजमान।

                    Brahman shines forth,
vast, self-iumious, inconceivable,
subtle than the subtle.
He is far beyond what is far,
yet here near at hand.
He is seen here, dwelling in
the cave of the hearts of
conscious beings.
                                                                       …. Mundaka Upanishad 3.1.7 
भारत का आध्यात्मिक साहित्य जिसकी हम अभी चर्चा कर रहे हैं] वह प्राचीन भारत के संत] मुनि] सिद्धजन व विचारकों की स्वप्नद्दष्टि है। इस पर गहन अध्ययन की आवश्यकता है क्योंकि शब्द सत्य की गहराई लिये प्रकट हुए हैं। वैदिक स्त्रोत बात करते हैं सत्-असत् के सर्वव्यापी नियमों की] द्वैत-अद्वैत के विशिष्ठ पक्षों की] तत्व-अतत्व की धारणा की जो मूलभूत कण (basic particle) तक जाती हैं  जो न तो सत् है और न ही असत्] जो space o time से रहित है। वह सर्वविद्यमान सत् के अद्वैत्ववाद के दर्शन   के आगे Unified field तक जाते हैं --- वे ब्रह्म के स्तर तक जाते हैं जो वह बिन्दु है जिसके आगे सबकुछ समझ के परे है। वेद को इसलिये समय के परे कहा गया है।
जब शब्द ग्रंथों में महत्ता पाते हैं] तब जीवन व भाषा एक समान पवित्र हो जाती है। वैदिक ज्ञान स्थापित है संहिता (जिसमें सिर्फ वैदिक मंत्र हैं) और ब्राह्मण व आरण्यका (चूंकि वे वन में रचित किये गये थे) में जहाँ वे मिलकर वेद बनते हैं। इनसे ऋषि-मुनियों को उपनिषद की रचना में मदद मिली] जिन्हें मिलाकर वेदान्त बना। वेदान्त में हमें परमात्मा (ब्रह्म)] आत्मा और ब्रम्हांड़ का चित्रण मिलता है।
यहाँ हमें सत् चित आनंद का जिक्र मिलता है जो ब्रह्म को इंगित करता है और इसे गहन मनन से ही समझा जा सकता है। तैतरिया उपनिषद स्पष्ट करता है कि ब्रह्म को उसके मानव की आत्मा पर ब्रह्मानंद के प्रभाव से जाना जा सकता हैः-
वह जो जानता है कि ब्रह्म के आनंद]  जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता और न ही मन-मस्तिष्क से प्राप्त किया जा सकता है] भय से मुक्त है। वह विचारों से व्यथित नहीं हो सकता । मैं जो सही है वह क्यों नहीं कर पाता\ मैं जो गलत है वही क्यों कर पाता हूँ\ वह जो ब्रह्म के आनंद को जान पाता है जो पाप पुण्य से अवगत होकर दोनों से ऊपर हो जाता है।


He who knows the joy of Brahman, which words cannot express
and the mind cannot reach,
is free from fear.
He is not distressed by the thought
. Why did I not do what is right?
Why did I do what is wrong?
He who knows the joy of Brahman,
knowing both good and evil
transcends them both.
                                                                       ….. Taittiriya Upanishad 2.7-9
ब्रह्म के साम्राज्य की कोई सीमा नहीं है --- वह मुक्त क्षेत्र है --- वह  space है जो असीम है। वह स्पेस व समय से परे है। वह नित्य है और उसकी स्वतंत्रता भी असीम है। वह कारण] परिणाम और कारण के रचिता सब मिलाकर एक है। वह पूर्ण है और पूर्णकारी है। उसके लिये सत्य] अनंत आनंद व प्रकृति ही सार है। वह सत् है --- सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का अर्थ है। उसके विषय में अथर्ववेद कहता हैः- 
ब्रह्म पूर्ण है
वह पूर्ण शक्ति युक्त है
पूर्ण ब्रम्हांड़ उस पूर्ण ब्रह्म से जीवन पाता है।
हम उस पूर्ण ब्रह्म को समझें
जो सभी जीव में जीवन प्रतिपादित करता है।

The creator is perfect,
He possesses perfect power.
The perfect universe derives life
from the perfect Creator.
Let us comprehend
this perfect power
that bestows life on all beings.
                                                                       …..Atharva Veda

प्रश्न उपनिषद कहता है-
वह सब जानकर सब का हो जाता है।
                              He knowing all, becomes all.

परन्तु जो कहता है कि वह ब्रह्म को जानता है] वह उसके एक कण को जानता है] फिर भी वह सब जानता है जो उसके जानने योग्य है। उसके एक कण को जानने का अर्थ है कि वह सब जानता है जो समझा जा सकता है।
अथर्ववेद में बहुत कीमती बात कही गई हैः-
जो उसे जानता है] स्वयं को जानता है और वह मृत्यु से नहीं डरता।
        Who knowth Him, knowth himself and is not afraid to die.

^स्वयं को जानना* हिन्दु दर्शन   का सारतत्व है। संसार में जो कुछ घटित हो रहा है उसके बीच मनुष्य को स्वयं की जिन्दगी जीनी पड़ती है। वह अपने मन-मस्तिष्क से शिक्षा पाता है। परन्तु मन आत्मा से दूर भ्रमण करने में गर्व महसूस करता है --- वह आत्मा के अस्तित्व को भूल जाता है। मन हमें तिलस्मी संसार को देखने और मजा लेने को उकसाता है। स्वतः को न जानना पूर्ण अज्ञानता है।
लेकिन हमारा अहं इस अज्ञान को ज्ञान की एक शाखा मान बैठता है। अज्ञान का यह छल हमारी जिन्दगी को पथभ्रष्ट करता है और हम अंततः उस बिन्दु पर पहुँच जाते हैं जहाँ हम थकान का अनुभव  करते हैं। हमारा यह अहं बिखर जाता है और जिन्दगी खाली शून्य सी बन जाती है। मुड़कोपनिषद कहता हैः
अज्ञात के बीच  रहकर
खुद को सांसारिक ज्ञान के अत्यधिक पोषण के कारण
भ्रमित जन बार बार दुख में भटकते हैं]
जैसे अंधा अंधे की अगुवाई करता है।
अज्ञान के विविध छल से लिप्त
ऐसे व्यक्ति सोचते हैं कि
जीवन का ध्येय हासिल हो गया है।
वे भावनात्मक आसक्ति के अधीन होते है और
इसलिये कभी भी सत्य को पा नहीं पाते
परन्तु वे उदासी में डूब जाते हैं]
जब सत्कर्मों का फल नहीं मिलता।

          Existing in the midst of ignorance,
thinking themselves wise
with a surfeit of worldly
knowledge, deluded beings wander
about suffering again and again,
like the blind led by the blind.
Preoccupied with the manifold
deceits of ignorance,
such people believe
they have achieved the goal of life.
They are, however,
subject to emotional attachments and
therefore never find the Truth
but are cast down in dejection
when the rewards
for any good actions are exhausted.
                                                                         ….  Mundakopanishad           
खुद को जानना --- आंशिक रूप से ही सही --- ज्ञान प्राप्ति ही है और यही बुद्धि है। स्वयं का ज्ञान होना वह पथ है जो हमें प्रभू का आभास कराता है। वेद में कहा गया हैः-
जैसे तिल में तेल
जैसे मलाई में मक्खन
जैसे जल छिपे झरनों में
जैसे ईंधन की लकड़ी में अग्नि
वैसे ही अंतः में आत्मा थमी होती है
जब कोई उसे सत्य में तल्लीनता से खोजता है।
आत्मा सर्वव्यापी है
जैसे दूध में मक्खन छिपा होता है]
वह स्वतः के ज्ञान का
तपस्वी के तप-सा स्त्रोत है।
यह ब्रह्मज्ञान है --- सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त कराता।

As oil in sesame seed,
as  butter in cream,
as water in hidden springs, 
as fire in fire sticks, 
so is the atman grasped in
one’s own self
when one searches for him
in truth and with fervour.
The atman pervades all’
like butter in milk]
He is the source of 
self knowledge and 
ascetic fervour.
This is the Brhman ---
teaching, the highest goal.
                       ….  Mundakopanishad 11.2.5-8  
अनुभूति (realisation) जैसे ग्रंथों में कहा गया है सामान्य आँखों से देखना नहीं हे] बल्कि चक्षुज्ञान से। यही वह द्दष्टि है जहाँ दिखनेवाला व देखनेवाला विद्यमान नहीं है। वास्तव में कोई भी द्दष्टि उसे समझ नहीं सकती पर उसकी पकड़ हर द्दष्टि पर होती है। मुंड़क उपनिषद का कहना है कि उसकी ^ध्यान* द्वारा अनुभूति ली जा सकती है।
आँखें उसे देख नहीं सकती
शब्द भी उसे प्रकट नहीं करते
ज्ञानेद्रियों] आत्मसंयम या कर्म
से उसे जाना नहीं जाता
जब मन ज्ञान की कृपा से स्वच्छ होता है]
उसे ^ध्यान* द्वारा देखा जा सकता है
--- वह जो एक है] अखंड़ित है।

Eye cannot see him,
nor words reveal him;
by the senses, austerity
or works he is not known.
When the mind is cleansed
by the grace of wisdom,
he is seen by contemplation
         --- the one without parts.
                                                …..Mundaka Upanishad 3.1.8
अनुभूति की यह भी व्याख्या की गई है कि यह चेतना की स्थिति में पहुँचना है जब कोई उन्नत प्रेम व अनंत द्दष्टि (vision) के बिन्दु पर आता है और तब वहाँ अचानक विद्युत का सा परिवर्तन दिखता है] जो उस अज्ञानता को हटा देता है जिसमें उसकी आत्मा पीड़ित हो रही थी। इस बदलाव के लिये अन्य कोई मध्यवर्ती स्थिति नहीं होती। केवल आत्मशुद्धि की स्थिति होती है जो आत्मा व परमात्मा के बीच की रुकावट को तोड़ती है और इसका अनुभव कराती है कि हम उसके साथ होकर एक हैं।
अनुभूति पाने का तरीका छंदोग्य उपनिषद में निम्न पंक्तियों में समझाया गया हैः-
अंधेरे से मैं अनेक रंगों की ओर जाता हूँ
अनेक रंगों से मैं अंधेरे की ओर जाता हूँ
सर्वपापों को त्यागता हुआ जैसे अश्व अपने केश
अपने शरीर पर से हटाता है
जैसे चंद्रमा अपने को राहू के मुख से मुक्त करता है
मैं कृतात्मा] ब्रह्म के अनिर्मित संसार में जाता हूँ
उससे गुजरता हूँ।

From the dark I go to the varicoloured
I go to the dark.
Shaking off evil, as a horse his hairs;
shaking off the body,
as the moon releases itself
from the mouth of Rahu;
I, a perfected soul (krtatman)
pass into the uncreated Brahma world
--- into it pass!
                                … Chandogya Upanishad
ज्ञान से घिरा  हुआ मन इंद्रिय-सुख के नशे  से] खुद के अस्तित्व में होने के नशे  से] मोह-भ्रम के नशे  से] अज्ञानता के नशे  से मुक्त हो जाता है। अनुभूति पाने के लिये यहाँ आत्मा की एकदम अलग भूमिका होती है। छंदोग्य उपनिषद कहता हैः-
स्मृति आत्मा से आती है] समझ आत्मा से] मनन आत्मा से] विचार आत्मा से] धारणा आत्मा से]  मन आत्मा से] वाणी आत्मा से] नाम (कीर्ति) आत्मा से] पवित्र सूत्र-मंत्र आत्मा से] पवित्र कर्म आत्मा से] सच में पूर्ण संसार आत्मा से आता है।      
                                                                .... छंदोग्य उपनिषद

Memory is from the self;
Understanding from self;
Meditation from the self;
Thought from the self;
Conception from the self;
Mind from the self;
Speech from the self;
Name from the self;
Sacred formulae --- mantra from the self;
Sacred works from the self;
Indeed this whole world from the self.                
                         …    Chandogya Upanishad
भूपेन्द्र कुमार दवे
भूपेन्द्र कुमार दवे
ब्रह्म की अनुभूति की तीव्र इच्छा] जिसे आध्यात्मवाद कहते हैं] आत्मा व मन जैसी उन्नत ज्ञानेन्द्रियों के कारण होती है] जैसे अणू के ^न्यूक्लियस्* के चारों ओर ^इलेक्ट्रान* घूमते हैं। जब सत्य का प्रकाश अपनी सहस्र किरणों से मन-मस्तिष्क पर छा जाता है तो मन जाग्रत हो जाता है। यह जाग्रत मन आत्मा व शरीर के अनुरूप विचार व कर्म करने लगता है। हिन्दु दर्शन के अनुसार आत्मा और हम एक हैं जिसमें मन व शरीर एक रूप हो जाते हैं। आत्मा] मन व शरीर के मिलन का अर्थ है एक घनिष्ट रिश्ता जहाँ मन व शरीर अपने आपसी प्रेम व सम्मान के साथ आत्मा को समर्पित होते हैं। मन व शरीर स्वयं को नियंत्रित कर आत्मा की आज्ञा का अनुसरण करते हैं। इसका अर्थ है कि मन व शरीर जब आत्मा में एक रूप होकर चैतन्यता प्राप्त करते हैं तो एक हो जाते हैं। इस तरह अनवरत चलते विचार व कर्म चेतना से शक्ति पाते हैं] जिसे ^प्राण* कहा जाता है --- जो परमात्मा का रथ है --- मौलिक बल है। इस तरह मानव शरीर संपूर्ण ब्रम्हांड़ के समान हो जाता है जहाँ हम ईश्वर के --- ब्रह्म के --- चेतना के आशय का रूप लेकर जीवन संचालित करते हैं। इस मानव जीवन का वर्णन कथोपनिषद में इस तरह किया गया हैः-
आत्मा को प्रभू का रथ समझो
शरीर रथ है
बुद्धि सारथी है
मन लगाम है
ज्ञानेन्द्रिय] वे कहते हैं अश्व है
और सांसारिक वस्तुऐं चारागाह हैं
ज्ञानी मनुष्य कहता है कि आत्मा] मन व
ज्ञानेद्रियों के साथ मिलकर 
सांसारिक वस्तुओं का आनंद लेती हैं।

Know that the soul is the lord of the Chariot,
the body is the chariot,
the intellect is the charioteer,
the mind is the reins.
The senses, they say, are the horses
and the material objects 
are the fields of pastures.
The wise men say that the soul, 
joined with the mind and senses, 
enjoys the material objects.
                     … Kathopanishad
इस सुन्दर काव्य रचना में मैं आगे कहना चाहूँगा कि भारतीय दर्शन को प्रतिपादित करती वैदिक ऋचाऐं वह आवाज हैं जिसे सुन अश्व (ज्ञानेन्द्रियाँ) आनंदित होकर गन्तव्य की ओर तेजी से बढ़ती हैं। यह आवाज हमारे पवित्र ग्रंथों के अध्ययन से मन में विकसित पवित्र विचारों की ध्वनि है।
हिन्दु दर्शन ब्रम्हांड़ के देवत्व या सबमें दैविक सत् की आध्यात्मिक एकता को प्रतिष्ठित करता है। आध्यात्मिक एकता वेद का अद्वितीय अंग बन जाती है जब वह उल्लेख करती है 
                         सर्ववंतरा ये पष्यंति सा पश्यंति।

He who sees the truth everywhere, sees  the reality.

जो सत्य को सर्वत्र देखता है] वह ब्रह्म की अन्तर्वर्ती अवस्था की चिन्गारी सर्वप्राणियों में देखता है।
हमारे पास उपनिषद की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैंः-
पूर्णमद पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
                           (Brihadaranyak Upanishad, 5.1.1)
That is full; this is full. From fullness, fullness comes out. Taking fullness from fullness, what remains is fullness.
वह पूर्ण है] यह पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण प्राप्त होता है। पूर्णता में से पूर्णता निकाल देने पर भी पूर्ण शेष रहता है।

ऐसी पूर्णता में से निकाला गया एक लघुतम अंश भी उसी पूर्णता से भरा होता है। आगे कहा गया है कि  
पूर्णात् पूर्णमुदचति] पूर्णं पूर्णेत सिच्यते।                                                                                                                      …..  (Atarva Veda 10.8.29)
                        Full rises from full, full is also irrigated by full.

पूर्ण से पूर्ण उदित होता है] पूर्ण से पूर्ण ही सिंचित होता है।

अतः हम सब उस परम पूर्णता का अंश हैं जिसकी पूर्णता में से पूर्ण निकाल दिये जाने पर भी उसकी पूर्णता बनी रहती है। ऐसी शुद्ध पूर्णता का लिया हरेक अंश एक समान ही होता है। अतः इस संसार में हम सब उसकी पूर्णता को लिये हुए एक समान हैं। हम अपने को दूसरों से भिन्न न समझें। न हम दूसरों से श्रेष्ठ है और न ही दूसरों से तुच्छ। अतः कोई कारण नहीं कि हम दूसरों से ईष्र्या व घृणा करें या द्वेष] क्रोध को दूसरों के प्रति अंगीकार करें। समझो कि यदि दूसरा दुखी है तो तुम भी दुखी हो और अगर दूसरा पापी है तो तुम भी पापी हो। समझो कि अगर वह सुखी हैं तो तुम सुखी होगे। अगर वह पुण्यवान हैं तो तुम भी पुण्यवान होगे। आत्मा को अहं की धूल] लालसा की काई और शरीर में छिपी जंग व मन में ऊगते विचारों की कंटीली झाड़ियों में मत दबे रहने दो। इन सबसे मुक्त आत्मा को मुखरित होने दो। अंतरात्मा जानती है कि एक आत्मा की शान्ति का अर्थ कदापि दूसरी आत्मा की अशान्ति नहीं होती। अतः खुद को संवारने के लिये सबको संवारो जिससे जहाँ तुम रहो वह तुम्हें स्वर्ग-सा लगे। तुम्हारी अंतरात्मा ऐसे ही वातावरण में रहने के काबिल व इच्छुक है।  
स्वयं को और अपने जीवन को इतना पारदर्शी बनावो कि तुम्हारी अंतरात्मा की छवि का प्रकाश बाहर आकर तुम्हारे बाहरी सौन्दर्य को भी प्रकाशित करे। यह प्रकाश अलौकिक है और यही तुम्हारी ऊर्जा है। इस तरह तुम ब्रह्म के समकक्ष होगे और शुद्ध सचेतना (ब्रह्म) की शक्ति सहित होगे। याद रखो कि तुम सहित प्रत्येक मानव में सर्वश्रेष्ठ ईश्वरीय आत्मा है --- प्रकाश का शुद्ध संपूर्ण] जगमगाता उत्कृष्ट रूप।
चेतना को जाग्रत रहने दो। याद रखो कि जब तुम सोचते हो] तुम आत्मा से मशविरा करते हो। मन को प्रश्न करने दो और आत्मा को उन प्रश्नों का विश्लेषण करने व उत्तर देने दो।
पवित्र ग्रंथ को हमारा पथप्रदर्शन और सहायता करने दो।
जैसे झिलमिलाते तारे आकाश को सुन्दर बनाते हैं
जैसे सूर्य की किरणें पृथ्वी पर जीवन को चमकाता है
जैसे वायु पुष्पों की सुगंध को फैलाती है
यह दर्शन हमें प्रकाशवान जिन्दगी में अग्रसर होने दे।  

Let the sciptures guide and help us.
As the twinkling stars beautify the sky
As the rays of sun sparkle the life on earth
As the wind spreads the fragrance of flowers
As a lamp imitating the sun removes darkness
Let this philosophy lead us 
to an enlightened life.

                              



यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ''बूंद- बूंद आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैसंपर्क सूत्र - भूपेन्द्र कुमार दवे,  43, सहकार नगररामपुर,जबलपुरम.प्र। मोबाइल न.  09893060419.             

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