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अरे पथिक तू क्यों उदास ?    

अरे पथिक तू क्यों उदास ?      
कण कण मे जबकि है प्रकाश
अरे पथिक तू क्यों उदास ?
घेर खड़ी जो तुझे कालिमा
पथिक
मर्यादा उसकी परिमित है
चतुर्दिक उसके ध्वंस खड़ा
सत्ता उसकी नही अमिट है
डरा रही है मात्र रूप से
पथ तत्वो को कर अगोचर
ताकि थम जाये जग पथ मे
अपनी दृष्टि को ही खोकर
पाये फिर अस्तित्व कालिमा
निर्मित हो उसकी परिभाषा
और पराजित बांधे उससे
आश्रय पाने की आशा
पर तोड़ चलो तुम पथिक
इन द्वेषी षडयंत्रो को
कहां विजय आधार बनाती
स्थितियों के तंत्रो को
खोज रही वह समरभूमि मे
वरने को अपना जेता
करे विदीर्ण हृदय विघ्न का
बने अग्रणी नेता
तोड़ निराशा की कारा को
तू यदि लगा चलने
दीप केवल पथ पे नही
दिशाओ मे लगेगें जलने
ऊर्जा व्याप्त सभी मे है
पर होता नही सभी का दर्शन
जब तक प्राप्त नही कर लें वो
तुम्हारे संघर्षो का घर्षण
दीप अभाव की छोड़ व्यग्रता
कण कण मे जबकि है प्रकाश
अरे पथिक ! तू क्यों उदास ?

              - अनूप  सिंह 
               बीए तृतीय वर्ष 
               दिल्ली विश्व विद्यालय  

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