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आज और कल का साहित्य

सृष्टि का आरंभ 
साहित्य का है प्रारम्भ
काल परिवर्तित होते रहे
शब्द परिवर्तित होते रहे
विचार तरल होते गए
साहित्य
साहित्य
भाव मन मे सोते गए।
गूढ़ से मूढ़ लेखन हुआ।
प्रेम से दूर अंकन हुआ।
विषयों में विषमता बढ़ी
कथ्य की क्षमता बढ़ी
छन्द क्षमता छिन गई।
मन विषमता रम गई।
गद्य बोझिल हो गया।
पद्य धूमिल हो गया।
कहाँ है 'देवी'की यामा
कहाँ है पंत की ग्राम्या।
न अब कामायनी मिलेगी
न गबन गोदान खिलेंगी।
न सतपुड़ा के घने जंगल
न जिंदगी के अब है मंगल।
अब तो हाफ गर्लफ्रेंड है
व्हाट्स अप्प से करते सेंड है
दस रचनाएं एक दिन में लिखते है।
न वर्तनी न मात्रा का ध्यान रखते हैं।
साहित्य में न अब सरोकार दिखते है।
सब अपनी भड़ास लिखते है।
साहित्य सम्मानों की होड़ लगती है।
कविता हर मंच पर सजती है।
चुटकुले चुगली चबाली।
कविता है साहित्य से खाली।
कभी तराजू में तौलोगे उस जमाने को।
पासंग में भी न पाओगे इस शब्दखाने को।

 - सुशील शर्मा

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