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घर से बन संवर कर

घर से बन संवर कर वो,जब कभी निकलते हैं ।
उनसे रोशनी लेकर,सौ चिराग जलते हैं ।।

घर से बन सँवर कर
मन्दिरो के रखवाले,मस्जिदो के रखवाले ।
महोब्बत के रस्ते पे,साथ साथ चलते हैं।।

नींद अब नहीं आती,रात यूं गुजरती है।
मैं इधर तड़पता हूँ,वो उधर तड़पती है ।।

पुछ मत जवानों के,दिल पे क्या गुजरती है ।
ओड़नी तेरे सर से,जब कभी सरकती है।।

चाँद और सितारों में,खूब है चमक लेकिन।
क्या ये आपकी बिंदिया,इनसे कम चमकती है।।

इस तरह वो आती है,रोज़ मेरे ख़्वाबों में।
आसमान से जैसे,कोई परी उतरती है।।

आपसे से मिले हमको,ये अब हुआ है वैसा।
सातवा समर हो तो,खुद-ब-खुद लचकती है।।

मुझको ऐसा लगता है,खो गया हूँ कुछ मैं भी।
दोस्तों को अब मेरी शख्शियत खटकती  है।।

सामने बिठाकर मैं,उसको शेर कहता हूँ।
इसलिये मेरी हाशिन्द, हर ग़ज़ल चमकती है।।



 - हाशिम फिरोजाबादी

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