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नाराज तुम से नहीं

नाराज तुम से नहीं
खुद से हूँ
पता है जब तुम कहते हो की
कुछ पाने के लिए कुछ खोना
पड़ता तो मेरी रूह
काप जाती हैं
नाराज तुम से नहीं
अपराधबोध सा
लगने लगता हैं
खोने का डर
हर पल
हर लम्हा
हर वक़्त
लगा रहता हैं
पता नही क्या है और क्यों
हैं पर सच यही हैं
मैं भी रोकना चाहती हूँ
खुद को कदम रूकते
ही नही,
मेरे दिमाग मे ये बात घूस
गयी है निकलती ही नही
कोई इतना स्वार्थी कैसे हो
सकता हैं
अब चाह के भी मेरे पाँव पिछे
नही हट रहे
अगर ये मेरी नासमझी है
तो यही सही
तक़दीर मे जो लिखा हैं
उसे मिटा तो सकते नही
फिर दोस किसे लगाना और क्यों
जो हो रहा है होने दो
जीनव की ये लड़ाई
लड़ने दो ।।

एक लम्हा जो दिया तुमने

एक लम्हा जो दिया तुमने
किया था वादा तुम्ही ने
तोड़ा भी तुम्ही ने
खिलाकर पुष्प पावन सा
तोडा भी तुम्ही ने,

हँसाया था तुम्ही ने
रुलाया भी तुम्ही ने
उठा के मान पर्वत सा
झुकाया भी तुम्ही ने,

अपनाया था मुझे तुम्ही ने
नकरा भी तुम्ही ने
सींचा प्रेम से अपने
सुखाया भी तुम्ही ने

सुबह दिया तुम्ही ने
रात भी दी तुम्ही ने
कर के रोशन मेरा आँगन
अँधेरा भी किया तुम्ही ने


रचनाकार परिचय 
कविता त्रिपाठी 
गोरखपुर 
हिन्दी साहित्य 
बर्तमान में बी. टी. सी अध्यन

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