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तेरा दर्द जो है सीने में

बता दे इक बार तू
तेरा दर्द जो है सीने में
उसका क्या करें?

खेल खेलें जो जिंदगी का
समझकर हल्का हल्का ,
जीया जो संग हर पल
उलझकर तल्खा तल्खा ।
बता दे इक बार तू
तेरा लहर उठे जो सीने में
उसका क्या करें?

मतलब क्या होता इकरार का
समझ न पाए मगरूर बन,
छूरा दामन अपने प्यार का
चले उस डगर मशहूर बन।
बता दे इक बार तू
तेरा जहर फैले जो सीने में
उसका क्या करें?

हलक से निकल रही आवाज
इस बंदीगृह से होकर आजाद,
अजीज मेरे ज्यादा महफूज़ वहां
इंतजार करे तेरा ऐश जहां।
बता दे इक बार तू
तेरी याद जो है सीने में
उसका क्या करें?
तेरा दर्द जो है सीने में
उसका क्या करें?

तजुर्बे 

जिंदगी एहतियात बरतती
फिर भी कारण होते
जिंदगी आबाद करने के
जिंदगी तबाह करने के।
जिंदगी एहतियात बरतती
फिर भी कारण होते
जिंदगी खुशनुमा होने के
जिंदगी दुखनुमा होने के।
जिंदगी एहतियात बरतती
फिर भी कारण होते
जिंदगी के खुशनसीबी के
जिंदगी के बदनसीबी के।
जिंदगी एहतियात बरतती
फिर भी कारण होते
जिंदगी के सुलझने के
जिंदगी के उलझने के।
जिंदगी एहतियात बरतती
फिर भी कारण होते
जिंदगी के कठपुतली बन
जीवन के कर्म पथ पर
निरंतर आगे बढ़ते रहने के।


 तेरी अठखेलियां

चांदनी छिटक रही थी
अंधकार को भरसक
 बस में कर रही थी,
 रेणु रंजन
 रेणु रंजन
झिलमिल रौशनी में,
तुम दूर खड़े
मंद- मंद मुसकुराहटों संग
मुझे ही निहार रहे थे।

नदी किनारे  खड़ी थी
कलकल नद संगीत
मन मोह रही थी,
चांदनी रात मे,
आलिंगन में मेरे
नैनों की अठखेलियों संग
मुझे ही दुलार रहे थे ।

सपनों में खो रही थी,
निंद के आगोश में
तुम्हें ढूंढ रही थी,
सराबोर प्रेम चासनी में
तुम पास मेरे
चुपके से अपनी अंगुलियों संग
मेरे ही बाल संवार रहे थे।

जीवन के होर

महक रही बगिया
रंगीले पुष्पलता के बहारो संग,
चहक रही चिड़िया
पूरब से छिटक रही किरणियों संग।
चारों तरफ मच रहा शोर
सूरज निकल आया
बंध रहा नेह की  डोर,
गांव की गोरियां चली
पानी भरन पनघट की ओर।
 घर की देवियां
कराके  मधुर जेवनार
कर रही विदा पिया की
उसके कार्य स्थल की ओर।
कुछ इस तरह ही नित्य
 चलते रहते उत्सव
जीवन के होर में।
जन जीवन की यही कहानी
इस दुनिया के ठौर में।

मधुर तान

ओ सांवरिया !
क्यों छेड़ी मधुर तान
तेरी बांसुरिया?
मन बस मे रह न पाता,
खींच लाता यमुना के तीर।
सुन तेरी बंशी की धुन
रख न पाती राधा धीर।
सनन -सनन पवन पुरवाई
रह न पाता मन पर जोर,
थिरकने लगते तन- मन
पांजेब करता शोर।

निकल पड़ी है राधा
रास रचाने तुझ संग
हाथ लिए गगरिया
सखी सहेलियों के संग।
ओ कान्हा चितचोर!
लुका छिपी छोड़, आजा
विकल हो रही तेरी
अब राधा बावरिया ।




रेणु रंजन
शिक्षिका, राप्रावि नरगी जगदीश
पत्रालय : सरैया, मुजफ्फरपुर
मो. - 9709576715


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