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सादा जीवन उच्च विचार Simple Living and High Thinking

Simple Living and High Thinking
जिसके जीवन में सादा जीवन- उच्च विचार नहीं है, वह इंसान न होकर बहुरूपिया और पाखण्डी है। वह संसार में भार स्वरुपा है। उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं कहा जा सकता है।इंसान होने का ही अर्थ है मौलिकताओं से परिपूर्ण होना । यह संसार एक तरह की उल्टी कहाड़ी के समान है। हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अक्सर दूसरों को दबाने का यत्न करते हैं ।इसमें मिलता तो कुछ नहीं सिवाए अपना जीवन नष्ट करने के। छोटी -छोटी बातों पर घृणा करना इससे कोई इंसान महान नहीं बन पाता।याद रहे इस दुनिया में महानता से बढ़कर और कुछ नहीं है। यानी के सादा जीवन और उच्च विचार हमारे जीवन में एहम भूमिका अदा करते हैं।यह हमारे महानता के पथ के प्रदर्शक हैं। महापुरुषों ने जो संसार को आदर्श विचार दिए हैं ,यह संसार उन्ही आदर्शों पर टिका हुआ है। वह आदर्श ही हमारे जीवन का आधार हैं। सादा जीवन और सादे विचार मानव जीवन को उन्नति की तरफ़ लेकर जाते हैं। 

कम आवश्यक्ता से ईश्वर से निकटता :-

 हमारी आवश्यक्ताएं जितनी कम होगी हम ईश्वर के उतने ही निकट होंगे। इसलिए सादा जीवन जीने वाला इंसान उच्च एवं महान बनता है। सरलता और सादगी उसके व्यवहार में उच्च विचारों के कारण अपना स्थान दृढ बना लेती है। उच्च विचारों का इंसान के जीवन पर बहुत ही सकरात्मक प्रभाव पड़ता है। उच्च विचारों वाले मनुष्य का ह्रदय शांत तथा मन निष्कपट बना रहता है। मन की पवित्रता प्रेम ,सत्य और सादगी भरे गुणों को जन्म देती है। श्रेष्ठ विचार इंसान को स्वार्थ से दूर रख कर परमार्थ की तरफ़ ले जाते हैं। इसलिए हमें अपने विचारों को पवित्र करना होगा क्योंकि उच्च विचारों का मानव जीवन पर बड़ा ही सकरात्मक सोच वाला असर पड़ता है। यह मंत्र जीवन में खुशियां भर देता है। इसपर चलने पर कष्ट तो मिल सकते हैं परन्तु असफल नहीं हो सकते हैं। श्रेष्ठ विचारों और महानता प्राप्त करने के लिए सबसे पहले हमें सत्य के रास्ते पर चलना होगा इसे अपनाना होगा। क्योंकि एक सत्यवादी इन्सान ही दुसरे लोगों का विश्वास पात्र बनता है। इसके पश्चात ही  सहनशीलता , अहिंसा एवं उदार बनने का प्रयत्न करना चाहिए। इसलिए अहिंसा ,सत्य उदारता , प्रेम मनुष्य को उच्चता की तरफ़ ले जाते हैं सादा जीवन पवित्रता , विचार , सम्मान तथा यश को जन्म देता है इन गुणों को ग्रहण करने वाला राष्ट्र को गौरव प्रदान करता है। 

सादा जीवन-उच्च विचार अब बेमानी हो गया :-

सादा जीवन-उच्च विचार अब केवल शब्दों में ही कैद होकर रह गया है। आज की तरह इनका पराभव यों ही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ इन शब्दो का अर्थ भी समझ नहीं पाएंगी। समाज और देश की सारी समस्याओं की जड़  कोई है तो वह यही है कि हमने सादा जीवन भी छोड़ दिया और उच्च विचार भी। हर मामले में हमने इतना अधिक मूल्य बढ़ा दिया है कि एक आम गरीब इंसान तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। इस वजह से गरीब और अमीर के बीच की खाई इतनी बढ़ गई है अब समस्याओं, तनावों और संघर्षों के प्रपात की अट्टहास करती नीचे गिरती धाराएं ही इन्हें जोड़ पाती दिखाई दे रही हैं अन्यथा जमीन-आसमान का अंतर आ गया है।

गुजाराआसान :-

हमारे जीवन की आवश्यकताएं इतनी सीमित हैं कि उपलब्ध संसाधनों में हम अपना गुजारा आसानी से कर सकते हैं और दूसरों के लिए भी प्रबन्ध करने में हमें कहीं कोई समस्या नहीं आ सकती। लेकिन हमने आवश्यकताओं से अधिक का भण्डार करने की ऎसी कबाड़ी मानसिकता पैदा कर डाली है कि हम अपने नाम से, अपने लिए जमा तो खूब सारा कर रहे हैं लेकिन न हमारे काम पूरा आ पा रहा है, न औरों के काम। कैसे मानव हैं हम, जिन्हें किसी की पड़ी ही नहीं है। कैसे हम अपने आपको सामाजिक कहला रहे हैं, पता नहीं, कौनसा युग आ गया है। एक बार फिर हम अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को देखें, उसके हिसाब से चलें, जीवन में सादगी लाएं, विचारों में श्रेष्ठता लाएं, तो कोई कारण नहीं कि सामाजिक समरसता के भावों के जागरण के साथ ही समाज और राष्ट्रनिर्माण में भी हम अपना योगदान न दे पाएं। हमें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है, पाश्चात्यों का अंधानुकरण और दासत्व छोड़ें, अपने अतीत की ओर लौटें और पूर्वजों, महापुरुषों से प्रेरणा पाएं, फिर से अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं की जड़ों से जोड़ें, अपने आप यह धरती स्वर्ग बन जा सकती है । 

- डा. राधेश्याम द्विवेदी

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