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मातृ मंदिर की ओर

व्यथित है मेरा हृदय-प्रदेश
चलूँ उसको बहलाऊँ आज ।
बताकर अपना सुख-दुख उसे
हृदय का भार हटाऊँ आज ।।

चलूँ मां के पद-पंकज पकड़
नयन जल से नहलाऊँ आज ।
मातृ-मन्दिर में मैंने कहा-
चलूँ दर्शन कर आऊँ आज ।।

व्याख्या - प्रस्तुत पंक्तियों  में कवयित्री सुभद्रा कुमार चौहान जी कहती हैं कि उनका ह्रदय व्यथित है .अपने ह्रदय के दुःख को दूर करने के लिए वे माता के मंदिर में जाना चाहती हैं . उनके साथ अपना दुःख साझा करके अपने ह्रदय का बोझ कुछ कम करना चाहती हैं .माता के चरणों को कवयित्री अपने आंसुओं से धोकर अपना दुःख व्यक्त करेगी .इसीलिए वह माता के मंदिर के दर्शन के लिए जाना चाहती हैं .

२. किन्तु यह हुआ अचानक ध्यान
दीन हूं, छोटी हूं, अञ्जान!
मातृ-मन्दिर का दुर्गम मार्ग
तुम्हीं बतला दो हे भगवान !

मार्ग के बाधक पहरेदार
सुना है ऊंचे-से सोपान ।
फिसलते हैं ये दुर्बल पैर
चढ़ा दो मुझको यह भगवान !

व्याख्या - सहसा कवयित्री को ध्यान आता है कि वह दीं हीन हैं और माता के मंदिर जाने का मार्ग दुर्गम हैं .इसीलिए माता से प्रार्थना करती हैं वे उसे मंदिर तक पहुँचने का मार्ग दिखला दे .मंदिर के सीढ़ियां बहुत ऊँची ऊँची हैं ,रास्ते में बाधक पहरेदार खड़े हैं ,जो कवयित्री का मार्ग रोकने के लिए तत्पर हैं .उसके दुर्बल पैर फिसलते हैं .अतः ऐसी स्थिति में माता ही मंदिर तक पहुँचने में सहायता करें .

३. अहा ! वे जगमग-जगमग जगी
ज्योतियां दीख रहीं हैं वहां ।
शीघ्रता करो, वाद्य बज उठे
भला मैं कैसे जाऊं वहां ?

सुनाई पड़ता है कल-गान
मिला दूं मैं भी अपने तान ।
शीघ्रता करो, मुझे ले चलो
मातृ-मन्दिर में हे भगवान !

व्याख्या - कवयित्री कहती हैं कि मंदिर में दूर से ही जग मग जगमग ज्योति दिखाई दे रही हैं ,साथ वाद्य यंत्र बज रहे हैं .इसीलिए वह जल्द से जल्द पहुंचना चाहती हैं ,लेकिन उसे कोई उपाय नहीं दिखाई दे रहा है .मंदिर में बज रहे गीतों से वह अपनी तान मिलाना चाहती हैं .इसीलिए वह भगवान से प्रार्थना करती हैं कि जल्द से जल्द वह माता के मंदिर में पहुंचे .

४.चलूं मैं जल्दी से बढ़ चलूं
देख लूं मां की प्यारी मूर्ति ।
अहा ! वह मीठी-सी मुसकान
जगाती होगी न्यारी स्फूर्ति ।।

उसे भी आती होगी याद
उसे ? हां, आती होगी याद ।
नहीं तो रूठूंगी मैं आज
सुनाऊँगी उसको फरियाद ।।

व्याख्या - कवयित्री जल्द से जल्द माता की प्यारी मूर्ति देख लेना चाहती हैं . प्यारी मूर्ति को देखकर उनमे एक अनोखी स्फूर्ति आ जाती है .जिस तरह कवयित्री माँ को याद करती हैं ,उसी तरह माँ भी उसे याद करती होंगी .यदि माता कवयित्री को याद नहीं करती हैं ,तो वह उनसे रूठ जायेंगी और अपनी फ़रियाद करेंगी .

५. कलेजा मां का, मैं सन्तान,
करेगी दोषों पर अभिमान ।
मातृ-वेदी पर घण्टा बजा,
चढ़ा दो मुझको हे भगवान् !!

व्याख्या -  कवयित्री कहती हैं कि मैं जैसे भी हूँ ,जितने भी दोष मेरे अन्दर होंगे ,माता सभी दोष माफ़ कर देंगी .वह कुमाता नहीं हो सकती हैं . माता की रक्षा के लिए मातृ-वेदी का घंटा बजा है ,इसीलिए मैं उनकी रक्षा के लिए अपना बलिदान कर दूँगी .

6. सुनूँगी माता की आवाज,
रहूँगी मरने को तैयार।
कभी भी उस वेदी पर देव !
न होने दूँगी अत्याचार।।

न होने दूँगी अत्याचार
चलो, मैं हो जाऊँ बलिदान
मातृ-मन्दिर में हुई पुकार
चढ़ा दो मुझको हे भगवान् ।

व्याख्या - कवयित्री कहती हैं कि वह भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने को तत्पर हैं .माता पर कभी भी अत्याचार नहीं होने देंगी .अपना माता का अपमान व अत्याचार नहीं होने देंगी ,चाहे उन्हें अपने जीवन को न्योछावर करना ही पड़े. जब भी भारत माता की रक्षा के लिए पुकार हो ,तब वह अपना आत्म - बलिदान करने को तत्पर हैं .

मातृ मंदिर की ओर कविता का सार Summary of matri mandir ki aur

मातृ मंदिर की ओर कविता सुभद्राकुमारी चौहान जी द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध कविता है . प्रस्तुत कविता में आपने अपने दुःख को कम करने के लिए उसका उपाय बताया है . इसीलिए वह इस दुःख को कम करने के लिए भारत माता के मंदिर में जाकर ,उनके चरणों पर सर रखकर जी भर का रोना चाहती  है . जिससे उसका मन हल्का हो सकेगा .मंदिर दूर व दुर्गम स्थान पर है . जहाँ जाना मुश्किल है व मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं . अतः वह भगवान् से प्रार्थना करती है कि हे भगवान ! मुझे उस मंदिर तक शीघ्र ले चलो जहाँ मैं उस महिमामयी माँ के दर्शन करना चाहती हूँ . जिस प्रकार मैं उन्हें याद कर रही हूँ वैसे ही उन्हें भी मेरी याद आ रही है . अतः मेरे भारत माता से प्रार्थना है कि वे मेरी माँ है और मैं उनकी संतान हूँ . ईश्वर ,भारत माता पर होने वाले अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए कवयित्री को  शक्ति दें कि वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति  आने वाली किसी भी प्रकार की बाधाओं को पार कर सके .


मातृ मंदिर की ओर  केन्द्रीय भाव / मूल भाव 

सुभद्राकुमारी चौहान जी द्वारा लिखित मातृ मंदिर की ओर कविता देशभक्ति से ओतप्रोत मार्मिक रचना है . आशा निराशा के झूले में झूलती कवयित्री अत्यंत दुखी है . कवयित्री अपन मन को शांत करने के लिए भारत माता के मंदिर जाकर उनके दर्शन करना चाहती है . उनके कमल रूपी चरणों को अपने अश्रु जल से धोना चाहती है . कवयित्री कहती है कि वे माता की एक आवाज पर अपना सम्पूर्ण जीवन बलिदान   कर सकती है. माता विदेशी शासकों  के अत्याचारों से दुखी है . अतः वह मातृभूमि की स्वतंत्रता से लिए अपना जीवन बलिदान कर देंगी .

मातृ मंदिर की ओर उद्देश्य 

मातृ मंदिर की ओर कविता सुभद्राकुमारी चौहान जी द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध कविता है .मातृ मंदिर की ओर कविता का मुख्य उद्देश्य जन जन में देश भक्ति की भावना को जाग्रत करना है .सच्चा देशभक्त वही होता है जो अपनी मातृभूमि  पर हो रहे अत्याचार से व्याकुल हो जाता है कि वह किसी भी रूप में किसी भी प्रकार से अपनी भारत  माता के दुखों को दूर करेगा . ऐसे देशभक्त को देशभक्ति के मार्ग में आई बाधाओं को किसी भी प्रकार दूर करना चाहते हैं . कवयित्री अपनी माँ की मूर्ति को देखने के लिए आकुल है . वह भारत माँ के चरणों में अपना जीवन समर्पित करना चाहती है .अतः हम कह सकते हैं कि देशवासियों में देशभक्ति के भाव जगाना व उन्हें भारत की स्वतंत्रता संग्राम में अपने जीवन की बाज़ी लगाने के लिए उन्हें प्रेरित करना कविता का मुख्य उद्देश्य है . 



प्रश्न उत्तर 


प्र.१ कवयित्री का ह्रदय क्यों दुखी है ?

उ. कवयित्री देश की दशा के बारे में सोचकर दुखी है . वह भारत की परतंत्रता को देख कर ,देश वासियों पर हो रहे अत्याचार ,समाज में व्याप्त भेद भाव को देखकर दुखी है . वह भारत माता के मंदिर में जाकर अपनी व्यथा कम करना चाहती है .

प्र.२ कवयित्री ने किस बात का संकल्प किया और वह उसे किस प्रकार पूरा करेगी ?

उ. कवयित्री ने इस बात का संकल्प किया हुआ है कि वह भारत माता के मंदिर में जाकर दर्शन करेगी . वह माता को अपने देश वासियों की दीन हीन अवस्था को सुधारने के लिए प्रार्थना करेगी .

प्र.३ कवयित्री के मार्ग में कौन बाधक है ?

उ. कवयित्री भारत माता के मंदिर में जान चाहती है ,लेकिन मार्ग में खड़े पहरेदार उसे रोक रहे है . रास्ते की सीढ़ियाँ बहुत ऊँची है .इन सब बाधाओं  को पारकर कवयित्री माता के मंदिर टक पहुँचना चाहती है .

प्र.४ माता का स्वरुप कैसा है ?

उ. कवयित्री भारत माता के मंदिर के दर्शन करना चाहती है .माता की मूर्ति बहुत ही सुन्दर और मुस्कान लिए हुए है . इसीलिए कवयित्री इस रूप का दर्शन करना चाहती है .


प्र.५. कवयित्री ने मातृभूमि की मूर्ति की क्या विशेषता बताई हैं ?

उ. कवयित्री कहती हैं कि माता की मूर्ति बहुत प्यारी और अनोखी हैं .उनकी मधुर मुस्कान को देखकर उनके ह्रदय में एक अनोखी स्फूर्ति आ जाती है .

प्र.६. प्रस्तुत कविता में कवयित्री भगवान् से शीघ्रता करने को क्यों कहती हैं ?

उ. कवयित्री भगवान् से शीघ्रता करने को इसीलिए कहती हैं क्योंकि वह माता का दर्शन करने को उत्सुक है .वह मातृभूमि की झलक पाने के लिए व्याकुल है .इसीलिए भगवान् से कहती हैं कि उसे माता के  मंदिर में जल्द से जल्द पहुँचा दें .

प्र.७.  कवयित्री  किसमें तान मिलाना चाहती हैं और क्यों ?

उ -  कवयित्री को दूर से ही माता के मंदिर से आते गीतों की आवाज सुनाई दे रही हैं ,जिसके कारण उसका ह्रदय लालायित हो उठा है .इसीलिए माता की प्रशंसा में वह गीत गाना चाहती हैं ,जिससे माता की भक्ति हो सके .





विडियो के रूप में देखें -




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मात्र मंदिर की और समरी

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  1. is kavita mein kavyitri bhagwan se shighrata karne ko kyu kehti hain

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    1. कवयित्री भगवान् से शीघ्रता करने को इसीलिए कहती हैं क्योंकि वह माता का दर्शन करने को उत्सुक है .वह मातृभूमि की झलक पाने के लिए व्याकुल है .इसीलिए भगवान् से कहती हैं कि उसे माता के मंदिर में जल्द से जल्द पहुँचा दें .

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