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 मां / हिंदी कहानी 

ही मां, मैं नौकरी नहीं छोड़ूंगी, जाकर कह दो उनसे। अगर शादी करनी है तो उन्हें मेरी ये बात माननी होगी।' दीपिका ने गुस्से से कहा।
'देख दीपू, वे तुझसे नौकरी छोड़ने के लिए थोड़ी कह रहे हैं. वो तो बस इतना चाहते हैं कि तू अपने ऑफिस से तीन महीने की छुट्टी ले ले, ताकि उस घर में अच्छी तरह व्यवस्थित हो सके तू। और फिर इसमें गलत भी क्या है? तू शादी के एक सप्ताह बाद ही ऑफिस चली जाएगी तो अपने घर को, घरवालों को समझ ही नहीं पाएगी। उनकी पसंद-नापसंद कहां जान पाएगी।'
'नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मुझे ज्यादा से ज्यादा 15 दिन की छुट्टियां मिल पाएंगी। साफ-साफ बोला है मैनेजमेंट ने।'
'मैनेजमेंट ने कुछ भी नहीं बोला है। सब तेरे मन की कहानी है। अरे तेरी नौकरी नहीं छोड़ने की इसी जिद के कारण तीन रिश्ते हाथ से निकल गये। मैं कह रही हूं, अगर इस बार यह रिश्ता हाथ से निकल गया तो फिर देखना मैं क्या करती हूं। बड़ी आई नौकरी करने वाली। एक तू ही तो है जिसे कैरियर से प्यार है। हमने कहां पढ़ाई-लिखाई की है। नौकरी की है।'
'आपकी नौकरी सरकारी है मां। आप नहीं समझेंगी, प्राइवेट नौकरी में छुट्टियाें की कितनी मारा-मारी होती है। फिर मेरे ऊपर तो इतनी बड़ी जिम्मेदारी है। प्रोजेक्ट हेड हूं। इतनी लंबी छुट्टी पर चली गई तो मेरे प्रोजेक्ट का क्या होगा? और हां मां, एक बात और बोल देती हूं, अगर आपने मेरी बात नहीं मानी और छुट्टी की जिद पर अड़ी रहीं तो मैं इस बार भी शादी करने से इंकार कर दूंगी। और फिर कभी भी शादी नहीं करूंगी।'
'देख दीपू एक लड़की के लिए उसका परिवार पहले होता है, कैरियर बाद में। फिर कल को तेरे बच्चे होंगे तो क्या तब भी तू छुट्टी नहीं लेगी। देख ससुराल तेरे लिए नई जगह होगी, उसे जानने-समझने में समय तो लगेगा, इसलिए कह रही हूं।' उमा के स्वर में थोड़ा प्यार था इस बार।
'मैं सब जानती हूं मां और फिर इस बारे में अमर से बात भी कर ली है मैंने। उसे कोई परेशानी नहीं है।'
'उमा के बहुत समझाने पर दीपिका ने एक महीने की छुट्टी के लिए अावेदन कर दिया। शादी का मामला था और फिर दीपिका एक हार्ड वर्किंग एंप्लॉई थी, सो थोड़ी ना-नुकुर के बाद उसे छुट्टी मिल गई।'

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दीपिका पढ़ी-लिखी होने के साथ ही संस्कारी भी थी। न तो उसे अपने पद का गुमान था, न ही पैसे का। व्यवहारकुशल तो वह थी ही। सो शादी के एक महीने के भीतर ही उसने अपने ससुरालवालों का दिल जीत लिया। अमर तो पहले से ही उसे पसंद करता था। दीपिका के व्यवहार ने उसे उसके और करीब ला दिया।
शादी के एक साल होने काे थे। लेकिन अभी तक बच्चे की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी। अमर की मां नीलू से रहा न गया तो उन्होंने दबी जबान में दीपिका से इस बारे में पूछ ही लिया।
'मां अभी एक साल और प्रतीक्षा कीजिए। मेरा यह प्रोजेक्ट अगले साल पूरा हो जाएगा, तब आपकी बात मान लूंगी मैं। प्लीज मां मुझे समझने की कोशिश कीजिए। ऐसा नहीं है कि मुझे बच्चे पसंद नहीं, पर मेरे लिए मेरा कैरियर सबसे महत्वपूर्ण है। बहुत मेहनत की है मैंने यहां तक पहुंचने के लिए।'
'क्या अमर को सबकुछ पता है।'
'हां मां, हम दोनों की सहमित से ही सब हो रहा है।'

'ठीक है जैसा तुम्हें ठीक लगे।' चेहरे पर थोड़ी उदासी लिए नीलू वहां से चली आई थी।
प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद दीपिका और अमर ने बच्चे के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया था.
'मां उठो देखो, दीपिका को उल्टियां हो रही हैं।' अमर के चेहरे पर घबराहट थी और वह लगातार नीलू का दरवाजा खटखटा रहा था।
'क्या हुआ, दरवाजा क्याें पीट रहा है?' नीलू ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।
'मां, दीपिका।'
'क्या हुआ दीपिका को।'
'उसे रात से उल्टियां हो रही हैं।' नीलू के चेहरे पर मुस्कुराहट खेल गई।
'मां वहां दीपिका की हालत खराब हो रही है और आप यहां मुस्कुरा रही हैं।'
'तू नहीं समझेगा पगले।' नीलू तेज कदमों से चलते हुए दीपिका के पास आई।

'दीपिका कैसी तबियत है अब?'

'अभी ठीक है मां।' एक हल्की सी हंसी दीपिका के चेहरे पर भी तैर गई।
नीलू की प्रतीक्षा समाप्त हो चुकी थी। दीपिका मां बनने वाली थी। सबकुछ सामान्य था, इसलिए दीपिका नियमित ऑफिस जाती रही। एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली।
आठवां महीना पूरा होते ही जब दीपिका ने मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया तो सबने उससे पूछा कि क्या उसे विश्वास है कि वह काम पर दुबारा लौटेगी।
'हां, हां क्यों नहीं। मां हैं घर में, वो संभाल लेंगी मेरे बच्चे को।'

'लेकिन जब तुम ज्वॉयन करोगी तो तुम्हारा बच्चा बहुत छोटा होगा। ऐसे में उसे तुम्हारे साथ की जरूरत होगी। कैसे मैनेज करोगी तुम नौकरी और बच्चा दोनों?' दीपिका की बॉस अजया ने पूछा।
'देखिए मैम, बच्चा अपनी जगह, कैरियर अपनी जगह। छह महीने की छुट्टी बच्चे के लिए ही तो ले रही हूं। अगर वो मां से नहीं संभला तो क्रेच में डाल दूंगी, लेकिन नौकरी नहीं छोड़ूंगी।' दीपिका ने दो टूक अजया से कहा।

'चलो जिसमें तुम्हारी खुशी। हम भी नहीं चाहते हैं कि तुम नौकरी छोड़कर घर बैठो।'

'थैंक्यू मैम।' दीपका ने खुश होते हुए कहा।
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'बधाई हो, दीपिका ने एक सुंदर सी बेटी को जन्म दिया है।' डॉक्टर ने जब बाहर आकर अमर को यह बात बताई तो घरवालों के चेहरे खिल उठे। छह महीने की हो चुकी थी ईशी। मातृत्व अवकाश भी खत्म हो चुका था। आज दीपिका को ऑफिस ज्वॉयन करना था। वह तैयार हो चुकी थी। ईशी को नीलू की गोद में देकर, उसका माथा चूमकर झटके के साथ बाहर निकल आई वह। लेकिन ये क्या, उसके पैर तो आगे ही नहीं बढ़ रहे थे। वह वापस ईशी के पास लौट आई। एक बार फिर उसे गोद में लेकर प्यार किया।
'बाय बेटे। ममा शाम को आएगी तब आपके साथ खेलेगी। तब तक आप दादी के साथ खेलना, बाय।'
'दीपिका जल्दी आओ बाबा। देर हो रही है।' अमर ने आवाज लगाई।
ऐसा पहली बार हुआ था जब ऑफिस जाने का मन नहीं कर रहा था दीपिका का। वह पूरे रास्ते अनमनी सी बैठी रही। ऑफिस पहुंचकर औपचारिकतावश सबसे हाय, हैलो करते हुए उसने अपनी केबिन में प्रवेश किया। अपनी कुर्सी पर बैठते हुए पहले सी खुशी महसूस नहीं हो रही थी आज। उसे आये हुए दो घंटे हो चुके थे, लेकिन अब तक वह काम पर ध्यान नहीं लगा पाई थी। उसकी आंखों के सामने बार-बार ईशी का भोला सा चेहरा घूम जा रहा था। आंखों से आंसू बह निकले थे उसके। कपड़े भी दूध से गीले हो गये थे। नहीं, मैं अपनी बच्ची के बिना नहीं रह सकती, साेचते हुए दीपिका दो बार कुर्सी से उठी और फिर वापस बैठ गई। लेकिन काम में ध्यान नहीं लगा पाई।
लंच का समय हाे चुका था।
'दीपिका लंच कर लो।' अजया की आवाज से उसका ध्यान टूटा। दीपिका और अजया साथ ही लंच करते थे।
दीपका के गले से एक कौर भी नीचे नहीं उतरा। वह अजया के केबिन से निकल आई। थोड़ी देर बात जब वह वापस आई तो उसके हाथ में इस्तीफा था।
'यह क्या है?' अजया ने पूछा।
'मेरा इस्तीफा मैम। मुझे नौकरी नहीं, मेरी बच्ची का साथ चाहिए। मेरी प्राथमिकताएं बदल गयी हैं। अब मैं एक मां हूं। मेरे लिए अपनी बच्ची के पास रहना ज्यादा जरूरी है।'
इससे पहले की अजया कुछ कहती, दीपिका उसकी केबिन से बाहर निकल आई थी। घर पहुंचकर ईशी को सीने से चिपकाकर वह जोर-जोर से रो पड़ी थी। ईशी को दूध पिलाते हुए, उसकी बालों में अंगुलियां फिराते हुए एक अजीब सा सुख महसूस कर रही थी वह।
'अरे दीपिका, आज इतनी जल्दी कैसे?' आॅफिस से आते ही अमर ने पूछा।
'मैंने इस्तीफा दे दिया।'
'लेकिन क्यों? तुम्हें तो नौकरी बहुत पसंद थी। कहीं कोई बात तो नहीं हो गई तुम्हारी अनुपस्थिति में।'
'नहीं ऐसा कुछ नहीं है। मैं कामकाजी महिला नहीं, एक मां बनना चाहती हूं। हर पल अपनी बच्ची के पास रहना चाहती हूं।'
'जैसी तुम्हारी इच्छा।' अमर ने कहा और कमरे में चला गया।
एक सप्ताह बाद ही दीपिका के पास अजया का फोन आया।
'दीपिका कल हमने तुम्हारे लिए एक फेयरवेल पार्टी रखी है। अमर और ईशी के साथ जरूर आना। और हां, कोई बहाना नहीं चलेगा।'
'जी मैम।' 
अगले दिन अमर और ईशी को साथ लेकर जब दीपिका ऑफिस गई, तो अजया उसे और अमर को लेकर कांफ्रेंस रूम में आ गई।
'दीपका हमने इसी ऑफिस में एक क्रेच की व्यवस्था की है। कल से ईशी वहीं जाएगी। और हां, मैंने तुम्हारा इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। तुम काम भी करोगी और बीच-बीच में ईशी से मिलती भी रहोगी। अब तो कंफर्टेबल हो न तुम? तुम्हारी बेटी तुम्हारी आंखों के सामने रहेगी। ईशी बेटी का आज ही यहां एडमिशन होगा। उसके बाद दूसरे स्टाफ के बच्चों का यहां एडमिशन लिया जाएगा। अब तो खुश हो।'

'बहुत खुश। थैंक्यू मैम, थैंक्स ए लॉट।'

'नो थैंक्यू प्लीज। एक मां अपने बच्चे के लिए पूरी जिंदगी दे सकती है तो क्य एक कंपनी उसके बच्चों के लिए क्रेच की व्यवस्था नहीं कर सकती। मुझे पहले ही एेसा करना चाहिए था। खैर, देर आए, दुरुस्त आए।'

'मैम पार्टी, दीपिका ने चहकते हुए पूछा।'

'होगी, क्रेच खुलने की खुशी में।'

पार्टी में सब नाच-गा रहे थे। डीजे पर पुराने गाने की धुन बज रही थी -

'तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा ...........।'

दीपिका ईशी का चेहरा देख फूली न समा रही थी। 


- तरु श्रीवास्तव


यह रचना तरु श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गयी है . आप कविता, कहानी, व्यंग्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य करती हैं . आप पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2000 से कार्यरत हैं। हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हरिभूमि, कादिम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में बतौर स्वतंत्र पत्रकार विभिन्न विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। हरिभूमि में एक कविता प्रकाशित। दैनिक भास्कर की पत्रिका भास्कर लक्ष्य में 5 वर्षों से अधिक समय तक बतौर एडिटोरियल एसोसिएट कार्य किया। तत्पश्चात हरिभूमि में दो से अधिक वर्षों तक उपसंपादक के पद पर कार्य किया। वर्तमान में एक प्रोडक्शन हाऊस में कार्यरत हैं.आकाशवाणी के विज्ञान प्रभाग के लिए कई बार विज्ञान समाचार का वाचन यानी साइंस न्यूज रीडिंग किया।

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