0
Advertisement

पहचान तुम बनो

कोई गीत जो लिखूँ
वो साज तुम बनो,
सपनों की
परवाज़ तुम बनो,
कोई गीत

नींद आँखों मे जब-जब आये
वो ख्वाब तुम बनो
बात कुछ हो दिल की
अल्फ़ाज तुम बनो,

कुछ और कहा माँगा मैंने
जान जाये मुझे जवाना
पहचान तुम बनो,

जब कभी मै

जब कभी मै उन
रास्तों से गुजरती हूँ
तुम्हारी याद जरूर आती है
कुछ बातो को मन
में उपजाति है
कभी हम उन
रास्तो पे साथ चलते थे
मेरी बकबक से
तुम परेसान हो
जाते फिर मेरी
एक मुस्कान पे तुम
सब भूल जाते
कब वक्त गुजर जाता था
पता भी नही चलता था
और अब ना वक़्त गुजरता
ना ही वो रास्ते खत्म होते
जिंदगी का सफर
चलता ही जा रहा हैं
बिन तुम्हारे.....


सोचती हूँ अक़्सर में

सोचती हूँ अक़्सर में
कल्पनाओं मे
की काश कहीं कुछ यूं होता
जिंदगी पेंसिल से लिखी
इबारत होती
जिसे मिटा फिर लिखना
मेरे बस मे होता ।।
कुछ रिश्ते में गढ़ लेती
अनचाहे बंधनों से मुक्त हो कर
वक्त को अगर पलट पाती तो
तुझ पर भी मेरा कोई हक होता।।
थाम ली होती तेरा हाथ उस पल
तो शायद तू मेरा होता
उस पल को यदि में मिटा पाती
जादू की कोई रबर लेकर
बस सोचती हूँ
काश कहीं कुछ यूं होता.

प्रेम

उस रात मुझे
नींद नही आयी
सारी रात बस करवटे ही
बदलती रही ।।
अजीब सी हलचल मच रही थी
मन में...
दर्द हो रहा था पर कहा
नही पता था
कुछ टुटा था
जो टुटा था वो भी
मेरे पास नही था
वो रात मेरे लिए
इतनी लम्बी बन गयी
काटना मुश्किल हो गया
इस बात के साझी उस
कमरे की चार दिवारी
वो चादर की अंसख्य सिलवटें
वो तकिया जो
मेरे आशुओं भीग गए थे
मेरी डायरी जो मेरी
बरबादी पे मेरा मजाक
उड़ा रही थी वो मेरे
कमरे की घड़ी जो
अपनी टिक टिक
से मुझे बेचैन कर रही थी
सबके सो जाने पर भी मेरा
साथ दे रही थी और साथ में
कह रही थी कि कवि! समय एक
सा नही रहता समय
बलवान होता हैं
समय परीझा लेता है
सब ठीक हो जायेगा
समय से ये वक़्त भी
कट जायेगा समय से
वाकई सब गुजर गया
तुम गुजर गये
समय भी गुजर गया
वो वक्त भी गुजर गया
तुम्हारी यादो पे
धूल की एक परत सी
जम गयी
नादाँ होते हैं वो लोग
जो प्रेम में प्रतिशोध लेते है
जहा प्रेम में प्रतिशोध वहा
सच्चा प्रेम कहा
कास ये सारी बाते मैं
कह पाती तुमसे ...
पर सोचती हूँ अच्छा ही हैं
कुछ ख्वाहिशें
अधूरे ही बेहतरीन होते हैं।।


अगर रोने से आराम मिल जाये 

अगर रोने से आराम मिल जाये
तो आज मै भी
रो लूँ...
रो-रो के आँखें सुजा लूँ
अगर मिल जाये अराम उन
तमाम तकलीफों से
अगर मिल जाये शुकुन तो
कम कर लू रोके दिल
के बोझ को
जो बरसों से है..
उन यादों को मिटा दूँ
उन बातों को भुला दूँ
उन वादों को तोड़ दूँ
अगर रोने से अराम मिल
जाये तो आज मैं भी रो लूँ
हजार सवाल है
मिल जाये सबका जबाब
तो रो लूँ



रचनाकार परिचय 
कविता त्रिपाठी 
गोरखपुर 
हिन्दी साहित्य 
बर्तमान में बी. टी. सी अध्यन

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top