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एक स्त्री 


“ माँ ,आप कोर्ट में वही कहेंगी ,जो वकील ने आपको समझाया है ।”
“ बेटा ,मैं बहुत टूट चुकी हूँ ।”-विवाह के बाद झेले सारे मानसिक ,शारीरिक दुखों की वेदना सावित्री के स्वर में
ब्लात्कार
फूट पड़ी ।
“ माँ ,अभी आपकी टूटन के हिसाब का समय नहीं है।” “पिताजी को दुनिया भगवान मानती है ।उन पर इतना गन्दा इल्ज़ाम ! “
“ वो ऐसा कर ही नहीं सकते । आपने जो देखा वो आपका भ्रम है ।”
सावित्री व्यंग्य से -” वो क्या कर सकते हैं और क्या नहीं !
एक पत्नी होने के नाते मुझसे बेहतर कौन जान सकता है !”
“ और हाँ बेटा! माँ की टूटन पिता की दौलत के आगे क्या मायने रखती है !”
सावित्री व्यंग्य ,निराशा को ओढे स्वार्थी बेटे को देख और सुन रही थी ।
“ माँ ,बस ये याद रखना ,हमारा सारा वैभव ,ये दौलत,शान सब आपके बयान पर टिका है ।”
“ ठीक है बेटा ,आज तक जुबान बन्द रखी ।
आगे भी बन्द रखूंगी ।”--सावित्री ने अपनी बाजुओं पर पड़े जख्मों के दागों को घूरते हुए कहा ।
“ हेलो ,आंटी जी ।”
“कौन ?”-सावित्री ने अचानक फोन पर एक अपरिचित आवाज़ सुन कर कहा ।
“ आंटी ,मैं वही लड़की हूँ ,जिसके ब्लात्कार के केस में आपको अभी थोड़ी देर में गवाही देनी है ।”
“ आंटी ,आप ही एक चश्मदीद गवाह हैं ,जिसने उस रात बाबा जी यानी आपके पति को मेरा बलात्कार करते देखा था ।”
“ मैं चुप रहूंगी ।नही बोलूंगी अपने पति के खिलाफ ।
हमारी इज्जत ,हमारी सारी शान क्यों मिट्टी में मिलाऊँ ?”
“ आंटी !पत्नी ,इज्जत ,शान इन सबसे पहले बस एक बार सोचिएगा ---आप सबसे पहले एक स्त्री हैं !”--
लड़की की सिसकती आवाज़ सावित्री को चीर गयी ।
“ सावित्री देवी ,हाज़िर हों ।”
सावित्री जज के सामने थी ।
“ आपने उस रात क्या देखा ?”
सावित्री ने एक नज़र सामने अपराधी बन खड़े पति को देखा !
फिर नज़र घूमा वैभव व दौलत के लालची बेटे को देखा !
कोर्ट रूम में मौजूद पति के पक्ष में खड़ी वकीलों की फौज , सत्ता के नुमाइंदों ,खरीदी हुई मीडिया---सभी पर दृष्टि डाली !
कानों में उस रात की लड़की की चीखों को स्मरण किया !आंखों में पति की दरिन्दगी का दृश्य साकार किया!
हलक में जमे शब्दों को पिघलाते हुए कहा --” जज साहब यही है वो इंसान ! जिसने उस रात लड़की का बलात्कार किया ।मैंने देखा ।”
धन ,दौलत ,इज्जत ,शान ,पति ,बेटे,समाज के आगे एक स्त्री जीत गयी ।

- डॉ संगीता गांधी

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