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एक कदम बढा

मन कुछ कहती है
हवा कुछ कहती है
शाम ढल गयी है
शमा कुछ कहती है
वक्त चल रहा है ,गति से अपनी
चल साथ मेरे ये सुबह कुछ कैहती है
कब-तक खड़ा रहेगा,यूही पड़ा रहेगा
क्या तुझे मालूम नही के ये जग तुझपर हँसती है
चल साथ मेरे ये सुबह कुछ कैहती है
नदी की धार बनजा
सुन्दर फुहार बनजा
वक्त के रोके-न-रूके
ऐसी तेज तलवार बनजा
अपना रस्ता खुद बना
खुद में ही संसार बनजा
वक्त को बहने दे,अपनी गति से
उनकी गति में न,तु दिवार बनजा
अपना रस्ता खुद बना
खुद में ही संसार बनजा
एक कदम अपना बड़ा
जय कदम बड़ जायेंगे
आगे-आगे तु जायेगा
जग तेरे पीछे जायेंगे
अब ना यू देर लगा
एक कदम है
अपना रस्ता खुद बना
तु चल जग चलेगा पीछे तेरे
तु सोच-समझ पर ये न सोच
के कैसे बड़ेगा,ये जग एक सोच से तेरे
सोच-सोच में ना यू खो जा
एक कदम बड़ा
अपना रस्ता खुद बना
क्या सोचता है के तु अकेला है
ये तेरे सोच ही है
जो इन सबका झमेला है
इन झमेलों को अब तो दूर भगाना
एक कदम बड़ा
अपना रस्ता खुद बना
क्या तुझे मालूम नही
के तु किस अमरत्व की कहानी है
जिन्होने जी इस देश पे कुर्बानी
उन वीरों की तु एक निशानी है
अब तो ना उनका यू नाम गिरा
एक कदम बड़ा
अपना रस्ता खुद बना
जरा पुछ इन झरनो से
के कैसे इसने अपनी रहा बनाई है
ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से
गिरती-गिरती यहाँ तक आयी है
फिर भी ना बूझी प्यास इनकी
अपनी प्यास बुझाने ये आगे तक आयी है
आयी है जहाँ पे कई नदियाँ
उनसे मिलके इसने एक नदी बनाई है
महानदी है उस नदी का नाम
जिनसे इसने अपनी पहचान बनाई है
बनाई है सुन्दर सुलभ ये धरती
जब ये समुद्र से मिलन आयी है
समुद्र से मिलके इसने सबकी प्यास बुझायी है
सबकी प्यास बुझाने के बाद
इसने अपनी प्यास बुझायी है
बस इनकी तरह तु भी कुछ करके दखा
एक कदम बड़ा
अपना रस्ता खुद बना
खुद में ही संसार बनजा
एक कदम बड़ा!



रचनाकार परिचय 
गौतम कर्ष
पिता-स्वर्गीय श्री घुराऊ रम कर्ष
ग्राम-धाराशिव
जिला-जाँजगीर चॉम्पा छ.ग.
मो.9039232807

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